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आखिर क्यों एक गरीब, ‘गरीब’ ही रहता है?

Published on 26 September, 2016 at 11:38 pm By

गरीबी को अगर पारिभाषित किया जाए, तो यह वह स्थिति है, जिसमें एक इंसान के पास जीवन जीने के बुनियादी साधनों या इसके लिए धन का अभाव निरन्तर बना रहता है। वर्तमान समय में भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का आंकड़ा 29.8 प्रतिशत है।

एक गरीब होने का मतलब दो वक़्त की रोटी, पेट भर खाना नसीब नहीं होना, सिर छुपाने के लिए घर न होना, पैसों की किल्लत की वजह से बीमार होने पर अस्पताल में बेहतर इलाज न करा पाना, कई महीनों तक सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटते रहना है। वहीं, एक गरीब से जब हमने पूछा कि उसके लिए गरीब होने का मतलब क्या है, तो उसने बस एक शब्द कहा और वह शब्द है ‘दुर्भाग्य’। वहीं, कई मंदिरों के दर पर भीख मांगने वालों ने गरीबी को ही अपनी तकदीर मान लिया है।


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सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस गरीबी नामक समस्या का कोई इलाज नहीं हो सका। गरीबी देश के लिए एक ऐसी समस्या बनकर खड़ी हुई है, जो देश के आर्थिक विकास में बाधक है। गरीबी एक ऐसी बीमारी है, जिससे अपराध, अशिक्षा, जैसी कई समस्याएं जुड़ी हैं। देश में कई लोग आपको फुटपाथों पर भीख मांगकर, सड़कों पर ही जिंदगी गुजर-बसर करते नजर आएंगे। इन गरीब लोगों के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते।

वह अगर पढ़ना भी चाहें, तो गरीबी ही है जो उन्हें पढ़ने नहीं देती। एक साल, दो साल पढ़ने के बाद, वे स्कूल छोड़ देते है। परिवार वाले बच्चों को पढ़ा नहीं पाते, बच्चे पढ़ना भी चाहें तो पेट की खातिर पैसे जुटाने की चाह, उन्हें पढ़ने से दूर कर देती है। इस तरह गरीबी का यह ‘दुष्चक्र’ चलता रहता है।

वर्तमान समय में एक गरीब जहां थे, वह वहीं हैं- जबकि अमीर और अमीर बनते जा रहे हैं। भारत में इसकी एक विशेष वजह है, वह है ‘परिवारवाद’।

कभी विदेशी कंपनियों मसलन फेसबुक, गूगल में ऐसा परिवारवाद  देखने को नहीं मिलता। अगर कोई काबिल है, तो उसे काम मिलेगा। लेकिन यहां भारत में पीढ़ी दर पीढ़ी को ‘काम’ पर रखने का चलन है। मसलन, एक उद्योगपति का बेटा उद्योगपति बनता है। एक राजनेता का बेटा भी करियर के तौर पर राजनीति को चुनता है। एक अभिनेता का बेटा उसी क्षेत्र में करियर बनाने की सोचता है। कुल मिलाकर चीजें ‘फिक्स’ होती हैं। ऐसे में किसी और को खुद को साबित करने का मौका कैसे मिलेगा!

अब बात करते है सरकारी आकंड़ों की। भारत में योजना आयोग के मुताबिक हर महीने जो खानपान पर शहरों में 965 रुपए और गांवों में 781 रुपए खर्च करने में सक्षम है, उसे गरीब नहीं माना जा सकता है।

गरीबी रेखा की परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग का मानना है कि इस तरह प्रति दिन के हिसाब से शहर में 32 रुपए और गांव में 26 रुपए खर्च करने वाला शख्स, गरीबी रेखा से नीचे आने वाले लोगों को मिलने वाली सुविधा का हकदार नहीं बनता।

क्या आपको लगता है कि आसमान छूती महंगाई के इस दौर में एक दिन के लिए भी एक शख्स इतने पैसों के साथ अपना दिन का गुजारा कर सकता है? इसका जवाब हमको और आपको पता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट की बात करें तो इसके मुताबिक, भारत में आज भी लगभग 30 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। इंडिया एण्ड द एमजीडी नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में लगभग 30 करोड़ लोग गरीबी से पीडि़त हैं एवं उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, सफाई प्रबंध एवं बिजली की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

दुनिया भर में गरीबी से जूझ रहे लोगों का एक बड़ा हिस्सा भारत में है। अति गरीब लोगों का एक-तिहाई हिस्सा हमारे देश में है। अमीर और गरीब के बीच की यह खाई बढ़ने का एक और कारण ऊंची विकास दर भी है।

विकास दर के बढ़ने के साथ-साथ देश में खरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में इजाफा हो जाता है, लेकिन देश की बहुसंख्यक आबादी की बदहाली और मुसीबतें जस की तस बनी रहती हैं।



भारत में गरीबी का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या दर में हो रहा लगातार इजाफा भी है। भारत की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है उस रफ्तार से भारत की अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ रही।

अगर भारत के उन राज्यों की बात करें, जहां गरीबी ने लोगों को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो  60% गरीब बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरीखे राज्यों में रहते हैं। इन राज्यों के आदिवासी समुदाय की आर्थिक हालत बदतर हुई है।

इसके अलावा, इन क्षेत्रों में से अधिकांश या तो बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र हैं या सूखे जैसी स्थिति से ग्रस्त हैं। इस तरह की स्थिति में कृषि, फसल को काफी नुकसान पहुंचता है, जो इनकी आय का एकमात्र स्रोत है।

अंतर्राष्ट्रीय खाद्य अनुसंधान संस्थान द्वारा ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट 2012 के मुताबिक, भारत वैश्विक भूख सूचकांक में 65वें स्थान पर है। भारत में खाद्य उत्पादन की कोई कमी नहीं है, इसके बावजूद हमारे देश में अब भी पांच वर्ष से कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत सबसे अधिक है।

भारत 2020 तक एक महाशक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है, लेकिन इन गरीबों का क्या, हमारा देश अभी भी जीएचआई में सुधार करने में पीछे है।

अगर हम अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा की बात करते हैं, तो यह 1.25 डाॅलर प्रतिदिन है और साल 2010 में,  भारत में कुल जनसंख्या का 32.7 प्रतिशत इस रेखा से नीचे था।

क्या गरीबी से बाहर निकला जा सकता है?

हां, निकला जा सकता है। ऐसा नहीं है कि गरीबी को मिटाना संभव नहीं है, लेकिन सच्चाई यह है कि गरीबी को मिटाने की ईच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। सबसे पहले वह चाह उस शख्स को खुद अपने आप में जगानी होगी, जो गरीबी से जूझ रहा है। आज का इंसान जल्दी-जल्दी पैसा कमाना चाहता है या शॉर्टकट अपना कर बस एक दिन का गुजारा कर खुश हो जाता है।

शुरुआत में काम छोटा मिले या बड़ा, अपने काम में निपुण होना सीखना होगा। हम जब भी किसी अमीर को देखेंगे, तो पाएंगे कि उनकी आय का जरिया एक काम ही नहीं होता, वह अलग-अलग कामों में हाथ आजमाते हैं। इसी तरह से बस एक ही काम के पीछे न लगते हुए अपने मुताबिक, कोई और आय का स्रोत भी होना चाहिए।

अपने आप को एक ही चीज तक सीमित न रखें, नई-नई चीजों को सीखें जो आगे जाकर भविष्य में आपके काम आए। जितनी जरूरत हो उसके हिसाब से खर्च करना सीखें। बड़ा सोचें तभी गरीबी से मुक्ति मिल सकती है।

इसके साथ ही देश की सरकार को अकुशल कारीगरों के लिए न्यूनतम मजदूरी का मानक तैयार करना चाहिए। इसका पालन ठीक से हो, यह सरकार को निश्चित करना चाहिए।

गरीबी एक सामाजिक समस्या है। ऐसे में, देश के गरीबों और अक्षम लोगों को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी सरकार की तो है ही, लेकिन उद्योगपतियों और धनपतियों को भी रोजगार के नए-नए अवसरों को खोल इस कार्य में अपना सहयोग देने की जरूरत है।


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हर व्यक्ति को स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार है, चाहे वो अमीर हो या गरीब। इसलिए भारत से गरीबी को खत्म करना जरूरी है। सरकार पर ही निर्भर न होते हुए प्रयास उस शख्स को भी करना होगा, जो अभी गरीबी से दिन-रात अपनी लड़ाई लड़ रहा है।

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