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ये 7 भारतीय पर्यावरण को बचाने के लिए अभिनव तरीके से काम कर रहे हैं

Published on 12 July, 2018 at 9:00 am By

किसी भी समस्या का जश्न एक ‘दिवस’ के रूप में मना लेना आज का ट्रेंड है। मतलब पूरे दिन उस समस्या पर आप सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक बहसबाज़ी कर सकते हैं। यह दिन सौगंध खाने और खिलाने का होता है। आपको दिखाना होता है कि समस्या कितनी गंभीर है, जिसके लिए प्रोफाइल पिक्चर बदल कर संवेदना भी प्रकट कर सकते है। पर क्या कभी सोचा है कि इतना मात्र कर लेने से ‘समस्या’ का समाधान हो पाएगा?


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पर्यावरण की समस्या।

 

प्रदूषित हो रहा पर्यावरण भी उन ‘गंभीर समस्याओं’ में से एक है। हक़ीकत तो यह है कि हमें इस बात का अंदाज़ा ही नही है कि अगर प्रकृति का पोषण नहीं मिला तो त्राहि-त्राहि मच जाएगी। हम कभी एक तरफ फूटी पाइप लाइन, उससे व्यर्थ बहता पानी देखते हैं और वहीं दूसरी तरफ टैंकरों पर पानी के लिए खून बहते देखते हैं। कभी हम सफेद शेर के आगमन का जश्न अखबारों में पढ़कर मनाते हैं। तो कहीं पोलिथीन खाकर तड़पती गाय की सुध लेने वाला भी कोई ना मिला, पढ़कर दुःखी हो जाते हैं।

एयर कंडीशन कमरों में बैठकर हम ग्लोबल वार्मिग पर चाहें कितनी भी चर्चा कर लें मगर जब तक प्रकृति से प्यार और सृजन की भावना हमारे मन में नही जगेगी, तब तक हम इसका आनंद नही उठा सकते। आज इस आलेख में जिन 7 भारतीयों के बारे में बात करेंगे पर्यावरण कके मामले में किसी नायक से कम नहीं है।

 

1. प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन – इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर जिन्होंने कचरे और प्लास्टिक से सड़क बना दिया

 


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प्लास्टिक मैन ऑफ इंडिया के नाम से भी मशहूर  इंजीनियरिंग कॉलेज (टीसीई), मदुरै में केमिस्ट्री के प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन अपने इनोवेशन  के ज़रिए  कचरे और प्लास्टिक का इस्तेमाल कर सड़कें बनवाते हैं। देशी-विदेशी कंपनियों ने राजगोपालन वासुदेवन को पेटेंट खरीदने का ऑफर दिया, लेकिन पैसों का मोह छोड़ उन्होंने भारत सरकार को यह टेक्नोलॉजी मुफ्त में दी। अब इस तकनीक से हजारों किलोमीटर तक सड़क बन चुकी है। उनके इस सराहनीय कार्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया है।

 

2. एंजलिना अरोड़ा – 15 साल की उभरती युवा वैज्ञानिक

 

 

एंजलिना अरोड़ा ने इको-फ्रेंडली प्लास्टिक बनाने का बेहतर तरीका ईजाद किया है। एंजेलीना अरोड़ा मछलियों और झींगे से निकाले गए कचरे, केकड़े का ढाचा, झींगे की पूंछ और मछलियों के सिर आदि कोअपने साथ सिडनी स्थित गर्ल्स हाई स्कूल के साइंस लैब ले आई और उन पर रिसर्च करना शुरू कर दिया।आखिरकार, उन्हें एक हल्का, मजबूत और बायोडिग्रेडबल प्लास्टिक बनाने का तरीका मिल गया।

 

3. सतीश कुमार – कचरे के बेकार प्लास्टिक को ईंधन में  बदल दिया

 

 



सतीश कुमार ने ऐसी तकनीक तैयार की है जो प्लास्टिक को ईंधन में बदल देती है। ईंधन बनाने के इस प्रक्रिया में पानी का ज़रा उपयोग नहीं होता है। इस तकनीकी के द्वारा कचरे के प्लास्टिक को वैक्यूम से ईंधन में तब्दील किया जाता है।

 

4. अनुराग और सत्येंद्र मीना – कचरा दो पानी लो के तर्ज पर बनायी ‘स्वच्छ मशीन’

 

 

आईआईटी के दो छात्र अनुराग व सत्येंद्र ने एक ऐसी मशीन का निर्माण किया है, जिसमें आप सड़क किनारे फेंके गये खाली प्लास्टिक की बोतल और अल्युमीनियम के केन को डाल सकते हैं। इस मशीन का नाम है स्वच्छ मशीन। कचरे के बदले मशीन आपको 300 मिली. शुद्ध पानी देती है।

 

5. नारायण पीसापटी – जिस चम्मच से खाओ, उसे भी खा जाओ

 

 

2010 में एक बार नारायण पीसापटी  जब फ्लाइट में सफ़र कर रहे थे तब उन्होने  एक गुजराती सहयात्री को खाकरा को चम्मच बनाकर मिठाई के साथ उस चम्मच को भी खाते देखा। यह देखकर नारायण पीसापटी को प्लास्टिक कटलरी का रिप्लेसमेंट मिल गया इडीबल कटलरी। यानी ऐसे बर्तन, जिन्हें खाया भी जा सकता है।

 

6. अफरोज शाह – वकील जिसने मुंबई के वर्सोवा बीच की सूरत ही बदल दी

 

 

अफरोज पेशे से हाइकोर्ट में वकील हैं। उन्होंने अक्टूबर 2015 में मुंबई के वर्सोवा बीच को साफ करने का अभियान शुरू किया था और 85 हफ्तों में ही शहर के सबसे गंदे बीच की सूरत बदल कर रख दी थी। उनके इस प्रयास की सराहना खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मन की बात कार्यक्रम में कर चुके हैं। अफरोज को उनके इस कार्य के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।  वह यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय हैं।

 

7. बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल – अकेले अपने दम पर बिन नदी का किया उद्धार

 

 


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बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल भारत के पंजाब राज्य के एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उनको ‘ईको बाबा’ के नाम से भी संबोधित किया जाता है। साल 2000 में बाबा सींचेवाल ने अकेले ही अपने दम पर बगैर किसी की मदद के 160 किलोमीटर काली बीन नदी को साफ करने का संकल्प लिया और ऐसा आंदोलन छेड़ा कि इस काम में धीरे-धीरे आम लोग से लेकर सरकार भी उनके सराहनीय कार्य में साथ हो गयी। कभी 40 नगरों के कूड़े से गंदे नाले में तब्दील बीन नदी के किनारे खड़े होने पर लोगों को नाक पर रुमाल रखना पड़ता था, अब उसी नदी के किनारे लोग पिकनिक मनाते हैं।

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