यह बैंगनी-नीले रंग का दुर्लभ फूल नीलकुरिंजी 12 साल में सिर्फ एक बार खिलता है

Updated on 3 Aug, 2018 at 5:27 pm

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प्रकृति ने अजीब-अजीब चीजों का निर्माण किया है और कई बार बारीकियों को समझने में विज्ञान भी असफल होता है। विशेषकर भारत पर प्रकृति कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। लिहाजा कई अनूठे उपहार हमें मिले हुए हैं। महाकुंभ का आयोजन 12 साल में एक बार होता है, जिसके अपने तर्क होंगे। आपको बता दें कि एक ऐसा फूल भी है जो 12 साल में एक बार खिलता है।

 

केरल का ‘नीलकुरिंजी’ पश्चिमी घाटी में पाया जाता है जो बेहद दुर्लभ माना जाता है!

 

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इस फूल का वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथस कुंथियाना है। केरल के मुन्नार में हर 12 साल पर ये खिलता है। स्थानीय भाषा में ही इसका नाम नीलकुरिंजी’ रखा गया है। यह पिछली बार साल 2006 में खिला था। इस बार फिर जुलाई के शुरुआत से ही मुन्नार की पहाड़ियां नीले रंग की हो चुकी है। लगातार तीन महीने तक देश-दुनिया से पर्यटक इसे देखने आएंगे और रोमांचित होंगे।

 

 

भारत में ‘नीलकुरिंजी’ के फूल की कुल 46 प्रजातियां मौजूद हैं और सर्वाधिक प्रजातियां मुन्नार में देखने को मिल जाती हैं!

 

 

मुन्नार के हरे-भरे चाय के बागान ‘नीलकुरिंजी’ के नीले रंग से ढंक गया है जिसके कारण मुथिरपुझा, नल्लथन्नी और कुंडल पर्वत श्रृंखला नीले रंग में तब्दील हो गया है। समुद्र ताल से इन पहाड़ियों की ऊंचाई 1600 मीटर है। साल 2006 में इस फूल से सजी पहाड़ियों को देखने 3 लाख पर्यटक मुन्नार आए थे। इस साल यह संख्या 8 लाख तक पहुंचने के आसार हैं।

 

 

केरल पर्यटन विभाग टूरिस्टों पर नजर रखती है ताकि प्रकृति को कोई नुकसान न हों। भीड़ को नियंत्रित रखने के लिए मुन्नार के ‘एराविकुलम नेशनल पार्क’ में प्रतिदिन 3500 लोगों को ही प्रवेश मिलता है। बताते चलें कि इस पार्क के लिए ऑनलाइन टिकट उपलब्ध हैं। वयस्‍कों के लिए 120 रुपये, बच्‍चों के लिए 90 रुपये और विदेशी नागरिकों के लिए 400 रुपये के टिकट दिए जाते हैं।

 

 


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भारत में ‘नीलकुरिंजी’ के फूल की कुल 46 प्रजातियां हैं, जिनमें से सर्वाधिक प्रजातियां मुन्नार में ही पायी जाती है।

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