देश की इस इकलौती जगह में तोप के धमाके से खुलता है रोजा, 200 साल पुरानी है परंपरा

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Updated on 15 Jun, 2018 at 7:33 pm

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इस्लाम में रमजान का पवित्र महीना पूरा होते ही ईद बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। ईद के मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग एकजुट होकर नमाज अदा करते हैं। एक-दूसरे को गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। कहा जाता है कि रमजान का पाक महिना लोगों को बेहतर इंसान और हृदय में दयाभाव का संचार रखने की ओर प्रेरित करता है। रमजान में महीने भर उपवास रखकर लोगों को जीवन में संयम रखने की सीख मिलती है। ऐसा नहीं है कि ईद का जश्न सिर्फ मुस्लिम ही मनाते हैं। अन्य धर्म के लोग भी इस जश्न में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। बच्चों में ईद को लेकर खासा उत्साह देखने को मिलता है। कई लजीज पकवान के साथ-साथ लोग इस दिन नए कपड़े पहन  ईद का जश्न मनाते हैं।

 

 


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ईद के मौके पर हम आपके लिए एक ऐसी जानकारी लेकर आए हैं, जिसके बारे में शायद ही आपको पता हो। दरअसल, मध्यप्रदेश में एक ऐसी जगह है, जहां तोप के धमाके के साथ रोजा खोला जाता है।

 

 

जी हां, मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में लोग आज भी यह अनूठी परंपरा निभा रहे हैं। वहां लोग रमजान में इफ्तार और सेहरी तोप के गोले की गूंज से शुरू और खत्म करते हैं।

कहा जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत भोपाल की बेगमों ने 18वीं सदी में की थी। ये अनूठी पंरपरा 200 साल से भी ज्यादा समय से कायम है।

 

 

पहले जहां बड़ी तोप का इस्तेमाल किया जाता था, अब वहीं छोटी तोप चलाई जाती है। जानकारी के अनुसार, किले को नुकसान न पहुंचे इसके कारण ही बड़ी तोप का इस्तेमाल बंद कर दिया गया।



 

रमजान के महीने में इस तोप को चलाने के लिए बकायदा लाइसेंस जारी होता है। कलेक्टर तोप और बारूद का लाइसेंस एक महीने के लिए जारी करते हैं।

 

 

इस तोप के उपयोग में करीबन 40 हजार रुपये तक का खर्चा आता है। इसमें तकरीबन 5 हजार रुपये नगर निगम देता है। बाकी खर्चा लोगों से चंदा मांगकर इकट्ठा किया जाता है।

 

तोप को रमजान के महीने में रोज चलाने का जिम्मा सखावत उल्लाह को सौंपा गया है। वह तोप में बारूद भरने का काम करते हैं। मस्जिद से इशारा मिलने के बाद वह तोप चला देते हैं। इस तोप को चलाने वाले खुद को खुशनसीब मानते हैं।

 

 

हालांकि,अब इलाके में शोर-शराबा बढ़ जाने के कारण तोप की आवाज दूर तक नहीं जा पाती, लेकिन पास के शहर और गांव के लोग गोला दागे जाने की आवाज पर ही अपनी सेहरी खत्म और रोजा खोलते हैं।


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