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एक दर्जी से ‘देवी’ बनने तक का राधे मां का सफ़र दिलचस्प है

Updated on 11 September, 2017 at 7:36 pm By

हाल ही में स्वयं को भगवान का दूत बताने वाले गुरमीत राम रहीम को अपनी दो महिला अनुयाइयों के साथ बलात्कार करने के जुर्म में 20 साल की सज़ा हुई। अब लगता है कि देश की नज़र ऐसे ही अन्य बाबाओं और धर्म गुरुओं पर है। इसका ताज़ा उदाहरण है राधे मां। खुद को देवी का रूप कहने वाली राधे मां पर प्राथमिकी दर्ज हो सकती है। पंजाब और हरयाणा हाईकोर्ट ने सुरेन्दर मित्तल कि दलील पर पंजाब पुलिस को यह निर्देश दिए हैं। फगवारा, पंजाब के रहने वाले मित्तल विश्व हिंदू परिषद् के सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया है की राधे मां ने पहले उन्हें बहकाया और फिर श्राप दे दिया।


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हालांकि, यह मामला दो साल पुराना है। अब मित्तल चाहते हैं कि हाई कोर्ट राधे मां के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। यह पहली बार नहीं है कि राधे मां इस तरह की किसी विवाद में फंसी हो। पंजाब के एक छोटे से शहर में दर्जी का काम करने से लेकर कथित रूप से देवी बनने तक, इन दो दशकों में राधे मां ने बहुत लम्बा सफ़र तय किया है। आइए जानते हैं राधे मां के बारे में कुछ अन्य तथ्य।

राधे मां का असली नाम सुखविन्दर कौर है।

3 मार्च 1965 को जन्मी राधे मां, मूल रूप से पंजाब के गुरदासपुर जिले में बसे दोरांगला गाँव की रहने वाली है। 

10वीं कक्षा तक पढ़ाई कर, 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने मोहन सिंह से शादी कर ली। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तब तक उनका झुकाव धर्म और भगवान की भक्ति में ज़्यादा नहीं था।

उनके पति की आमदनी ज़्यादा नहीं थी, तो घर चलाने के लिए उन्होंने कपड़े सिलने का काम किया। बाद में उनके पति जॉब तलाशने क़तर चले गए और वह आध्यात्मिकता के मार्ग पर चल पड़ीं।

23 वर्ष की उम्र में वह पंजाब के होशियारपुर के 1008 परमहंस बाग डेरा मुकेरियन के महंत राम देन दास की शिष्य बनी। महंत ने ही उन्हें राधे मां का नाम दिया।    

                  

राधे मां अपने शिष्यों और भक्तों से संग नृत्य करती हैं। यहां तक कि उनके भक्तों को उन्हें चूमने तक की अनुमति है। उनके मुताबिक यह उनका आशीर्वाद देने का तरीका है। उनका व उनके भक्तों का यह दावा है कि वह दुर्गा मां का पुनर्जन्म हैं।

वह तीन बच्चों की मां हैं और वास्तव में अब दादी भी बन चुकी हैं, लेकिन उनके अनुयायियों के अनुसार, राधे मां और उनके पति, बच्चों और नाती-पोतों के बीच के संबंध गुरु और शिष्य के हैं।


29 अगस्त 2015 को द्वारकापीठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद महाराज जी ने उन्हें नाशिक कुंभ मेले से प्रतिबंधित कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगा था कि “ऐसे उमीदवारों का प्रवेश साधुओं और महंतों के पवित्र क्षेत्र में बढ़ रहा है” इसलिए उन्होंने त्रिकाल भावंता, राधे मां, और सच्चिदानंदा को शाही स्नान का हिस्सा बनने से प्रतिबंधित कर दिया था।




उनके दो मुख्य शिष्यों में तल्ली बाबा और छोटी मां हैं। सभी प्रस्ताव पहले इन्हीं दोनों के पास आते हैं और फिर आगे राधे मां की पास भेजे जाते हैं। कथित तौर पर, छोटी मां ही एकमात्र ऐसे शिष्य है जो राधे मां की काफी करीबी है और उनकी सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी भी हैं। कहते हैं कि राधे मां ने खुद उन्हें दिव्य शक्तियां प्रदान की हैं।


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राधे मां को शायद ही कभी लाल और सुनहरी पोशाक के बिना सार्वजनिक तौर पर देखा गया हो, लेकिन जब दुबई में उन्हें बिलकुल ही अलग छोटे लाल रंग के कपड़ों में देखा गया तब मीडिया इस निष्कर्ष पर पहुंचा की, उनके पास कपड़ों की एक अलग अलमारी भी है।


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