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रानी पद्मावती की सच्ची कहानी जानकर आप भी उनके बलिदान को सलाम करेंगे

Published on 16 October, 2017 at 3:44 pm By

भारत वीरों की धरती रहा है। न केवल पुरुष, बल्कि महिला योद्धाओं ने भी भारत की अस्मिता को बरकरार रखने में अक्षुण्ण भूमिका निभाई है। चाहे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हों या फिर चित्तौड़ की रानी पद्मावती, भारत की इन वीरांगनाओं ने अपने अदम्य साहस से देश की दशा और दिशा बदल दी। जहां तक राजपुताने की बात है तो यहां की वीर महिलाओं ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर एक नई मिशाल कायम की।

रानी पद्मावती उन्हीं वीर महिलाओं में एक हैं।

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रानी पद्मावती का काल्पनिक चित्र।

पद्मावती के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रमुख मलिक मोहम्मद जायसी का लिखा गया पद्मावत है। इसे वर्ष 1540 में लिखा गया था।

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मलिक मोहम्मद जायसी।


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हालांकि, राजपुताना के लेखकों, अंग्रेज इतिहासकारों ने इस कथा को सर्वदा अलग-अलग तरीके से पाठकों के समक्ष रखा है। इन सभी कथाओं में एक साम्य है, वह है, पद्मावती का जौहर, जिसमें वह अन्य वीरांगनाओं के साथ खुद को आग की लपटों को समर्पित कर देती हैं।

कौन थीं रानी पद्मावती

रानी पद्मावती सिंघला राज्य (आधुनिक श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेना व उनकी पत्नी चम्पावती की पुत्री थीं। राजकुमारी पद्मावती को बचपन से ही तलवारबाजी और युद्धकला की पारंपरिक शिक्षा दी गई थी। यही वजह था कि पद्मावती तलवारबाजी में निपुण थीं। पद्मावती के विवाह के लिए राजा गंधर्वसेना ने शर्त रखी थी कि जो कोई भी व्यक्ति राजकुमारी को तलवारबाजी में हरा देगा, उसके साथ वह उनका ब्याह कर देंगे। पद्मावती के ब्याह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया। पद्मावती ने एक के बाद एक कई योद्धाओं को तलवारबाजी में मात दे दी। इसके बाद चित्तौड़ के राजा रावल रतन सिंह मैदान में थे। उन्होंने पद्मावती को तलवारबाजी में हरा दिया। इसके साथ ही उनका विवाह पद्मावती के साथ संपन्न हो गया।

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रानी पद्मावती और राजा रावल रतन सिंह का काल्पनिक चित्र।

मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत के मुताबिक, राजा रावल रतन सिंह के दरबार में कई कलाकार और योद्धा थे, जो उनके एक आदेश पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे। इन्हीं दरबारियों में से एक का नाम था राघव चेतन। वह न केवल राजा रावल रतन सिंह के लिए खूबसूरत चित्र बनाता था, बल्कि वह किले के अंदर की जानकारी भी उन्हें देता रहता था। हालांकि, उसने अपने बारे में एक सच्चाई छुपा रखी थी। राघव चेतन एक तांत्रिक भी था। तंत्र विद्या में कुछ इस कदर लिप्त था कि अगर किसी को भी उसकी गतिविधियों के बारे में पता चलता तो वह उसकी निर्ममता से हत्या करवा देता था। एक दिन राजा रावल रतन सिंह ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया और राजधानी से निकालने का आदेश दे दिया। राजा के इस आदेश से अपमानित राघव चेतन ने तय किया कि वह चित्तौड़ की ईंट से ईंट बजा देगा। वह चित्तौड़ से निकल कर दिल्ली की तरफ बढ़ा और एक जंगल में अपने दिन काटने लगा। उसी जंगल में अल्लाउद्दीन खिलजी शिकार के लिए नियमित तौर पर आता था।

इस्लामिक आतातायी खिलजी ने देश के कई राज्यों की राजधानियों में न केवल लूट-खसोट की थी, बल्कि उन्हें धूल-धूसरित भी किया था।

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अल्लाउद्दीन खिलजी।

जंगल में खिलजी के साथ पहली ही मुलाकात में राघव ने उसे चित्तौड़ के वैभव के बारे में जानकारी दी, साथ ही रानी पद्मावती की खूबसूरती का बखान भी किया। खिलजी ने तुरत तय किया कि वह चित्तौड़ की तरफ कूच करेगा। रानी पद्मावती से मिलने के लिए खिलजी इतना आतुर था कि उसने राजा रावल रतन सिंह को एक नोट भेजा और उसमें पद्मावती को अपनी बहन बताया और उनसे मिलने की इच्छा जताई। राजा रावल रतन सिंह का मानना था कि खिलजी ने जब रानी पद्मावती को अपना बहन बताया है तब उससे मिलने में कोई बुराई नहीं है। हालांकि, रानी पद्मावती ने खिलजी से मिलने से इन्कार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह खिलजी द्वारा बिछाया गया जाल है। पति रतन सिंह द्वारा बार-बार कहे जाने के बाद रानी खिलजी से मिलने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन उनकी शर्त यह थी कि खिलजी उनका प्रतिबिंब एक दर्पण में देखेगा।

अल्लाउद्दीन खिलजी अपने विश्वसनीय सिपहसालारों को लेकर चित्तौड़ पहुंचा। उसकी मंशा थी कि उसके सिपहसालार दुर्ग के सुरक्षा को बेहतर तरीके से परख सकें।

तय समय के मुताबिक जब खिलजी ने दर्पण में रानी पद्मावती का प्रतिबिंब देखा तब वह उनसे मिलने के लिए और अधिक आतुर हो उठा। वह किसी भी सूरत में रानी पद्मावती को पाना चाहता था। इसी क्रम में उसने राजा रावल रतन सिंह के अपहण की योजना बनाई, जो उसे दुर्ग से बाहर तक विदा करने के लिए गए थे। खिलजी ने रतन सिंह को बंदी बना लिया और चित्तौडगढ को संदेशा भेजा कि अगर रानी पद्मावती अगर अपने पति को जीवित देखना चाहती हैं तो उन्हें समर्पण करना होगा।



इसी क्रम में 1589 ईस्वी में हेमरतन द्वारा लिखी गई ‘गोरा बादल पद्मिनी चौपाई’ में राजपुताना के दो बहादुर योद्धाओं का जिक्र है, जिनके नाम गोरा और बादल थे। इस दस्तावेज के मुताबिक, गोरा और बादल ने अदम्य वीरता और साहस का परिचय देते हुए राजा रावल रतन सिंह को खिलजी की कैद से छुड़ा लिया।

अंग्रेज इतिहासकार जेम्स टॉड द्वारा लिखे गए इतिहास में भी इस बात की पुष्टि होती है।


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इतिहास के कुछ अन्य सूत्रों के मुताबिक, राजा रतन सिंह के भतीजे ने तमाम सैन्यबल को इकट्ठा किया और खिलजी की कैद से उन्हें छुड़ाने में कामयाब रहा।

इन कथाओं में एक साम्य है कि 150 पालकियों को खूबसूरती से सजाया गया था, जिन्हें लेकर राजपुताना के लोग अल्लाउद्दीन खिलजी के शिविर तक पहुंचे। खिलजी और उसके सेना नायकों को लगा कि इन पालकियों में रानी पद्मावती और अन्य महिलाओं को लाया गया है। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं। उन पालकियों में बहादुर राजपूत योद्धा थे। जब तक खिलजी और उसके सैनिक कुछ समझ पाते तब तक चित्तौड़ के योद्धाओं ने राजा रावल रतन सिंह को खिलजी की कैद से छुड़ा लिया।

इस घटना के बाद कामुक खिलजी क्रोध की आग में जल रहा था। खिलजी ने बड़े सैन्यबल के साथ चित्तौड़ के किले पर हमला कर दिया। राजपूत योद्धाओं के पास सिवाए लड़ने के और कोई चारा नहीं था।

अवनीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा वर्ष 1909 में लिखी गई राजकाहिनी में एक अलग ही कहानी है, लेकिन उसका अंत यही है।

खिलजी के विशाल सैन्यबल का सामना राजपुताना के मुट्ठीभर सैनिक कर रहे थे। रानी पद्मावती को इस युद्ध के परिणाम का पूर्वाभास हो गया था। यही वजह है कि उन्होंने जौहर की ठानी। उन्होंने घोषणा की कि राजपुताने के सम्मान की रक्षा के लिए वह आत्मदाह (जौहर) कर लेंगी।

रानी पद्मावती के साथ ही किले की अन्य महिलाओं ने भी जौहर कर लिया।

वहीं, खिलजी के साथ युद्ध में वीरता का परिचय देने के बावजूद राजा रावल रतन सिंह खेत रहे। युद्ध में जीत हासिल करने के बाद खिलजी अपने सैनिकों के साथ चित्तौड़ के किले में प्रवेश किया। उसे रानी पद्मावती नहीं, बल्कि राख मिली।


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मुस्लिम अाक्रांता खिलजी ने भले ही इतिहास के पन्नों का यह युद्ध जीत लिया हो, लेकिन उसे हारा हुआ ही कहेंगे। आज रानी पद्मावती की वीरता जनश्रुतियों में, दोहों में, कविताओं में, कथाओं में गूंज रही है। भारत की आने वाली पीढ़ियों को रानी पद्मावती पर निश्चित तौर पर गर्व होगा।

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