परमवीर चक्र विजेता लांस नायक करम सिंह ने सिखाया था पाकिस्तान को सबक

author image
Updated on 7 Aug, 2016 at 12:11 am

Advertisement

अक्टूबर 1948। जम्मू-कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में पाकिस्तानी सेना ने हमला कर दिया।

तिथवाल के पूर्व में नस्ताचुर दर्रे के पास रिछमार गली में आउटपोस्ट पर तैनात थे लांस नाइक करम सिंह। पाकिस्तान के इस औचक हमले में सेना के बंकर पूरी तरह ध्वस्त हो गए। इस पोस्ट का संचार संपर्क भी खत्म हो गया।

इस हमले में करम सिंह बुरी तरह घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अदम्य वीरता का परिचय देते हुए सामने की पंक्ति से हटने से इन्कार कर दिया। इस दौरान दुश्मनों की तरफ से फायरिंग जारी थी। लांस नायक करम सिंह असिमित साहस दिखाते हुए अपनी ट्रेन्च से बाहर निकल गए और 2 दुश्मनों को मार गिराया।

उस दिन पाकिस्तानी सैनिकों ने 8 बार हमला किया और प्रत्येक बार उन्हें करम सिंह और उनके साथियों की वजह से मुंह की खानी पड़ी। उनके इस साहसिक कदम ने दुश्मन को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।


Advertisement

तिथवाल की इस लड़ाई में अहम योगदान के लिए लांस नायक करम सिंह को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

इसी युद्ध के दौरान कम्पनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत ने परम साहस के साथ युद्ध किया कृष्णगंगा नदी के पास 17 और 18 जुलाई 1948 को और उनकी बहदुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।



लांस नायक करम सिंह भारत के दूसरे परमवीर चक्र से सम्मानित व्यक्ति थे।

लांस नायक करम सिंह का जन्म 15 सितम्बर 1915 को पंजाब के संगरूर ज़िले के भालियां वाले गांव में हुआ था। करम सिंह पहली बार 6 वर्ष की आयु में स्कूल भेजे गए, लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा। उनके पिता एक सम्पन्न किसान थे। बाद में यह निश्चय किया गया कि करम सिंह अपने पिता के साथ किसानी करेंगे, लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था। दरअसल, करम सिंह अपने चाचा से बेहद प्रभावित थे। उनके चाचा भारतीय फौज में कमांडिंग अफसर थे।

26 वर्ष की उम्र में करम सिंह 15 सितम्बर 1941 को सेना में शामिल हो गए। उनकी ट्रेनिंग रांची में हुई और बाद में अगस्त 1942 में उन्हें सिख रेजीमेन्ट में शामिल कर लिया गया। बाद में जो कुछ भी हुआ, वह एक इतिहास बन चुका है।

सिर्फ युद्ध के मैदान में ही नहीं, करम सिंह ने खेल के मैदान में भी अपनी धाक जमाई। वह न केवल कुश्ती का शौक रखते थे, बल्कि पोल वॉल्ट और ऊंची कूद में भी उनकी खास रुचि थी।

जम्म-कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ अपनी बहादुरी दिखाने वाले करम सिंह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी अपनी वीरता दिखा चुके थे। उन्हें 14 मार्च 1944 को सेना पदक मिला था। उन्हें पदोन्नति देकर लांस नायक बना दिया गया।

लांस नायक करम सिंह ने एक लंबा और प्रेरक जीवन जीया। उन्होंने वर्ष 1993 में अपने गांव में अंतिम सांस ली।


Advertisement

आपके विचार


  • Advertisement