…तो क्या अब प्राइवेट वाहनों को ओला-ऊबर में चलाने की अनुमति देगी सरकार?

Updated on 19 Apr, 2018 at 1:20 pm

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अब टैक्सी चलाने के लिए कॉमर्सियल लाइसेन्स की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा थ्रीवीलर्स, ई-रिक्शा और कमर्शल टू-वीलर आदि को भी इससे राहत दी गई है। अब इन वाहनों को चलाने के लिए प्राइवेट लाइसेंस का इस्तेमाल किया जा सकेगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने प्रदेश सरकारों को एडवाइजरी जारी कर दी है।

 

 


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सरकार के इस निर्णय से रोजगार के मौके बढ़ेंगे।

 

अब तक टैक्सी या इस तरह की किसी भी कॉमर्शियल वाहन को चलाने के लिए अलग से कॉमर्शिलय लाइसेंस लेना होता था। टैक्सी का लाइसेंस लेने के लिए प्राइवेट लाइसेंस लेने वालों को कम से कम एक साल तक इंतजार करना होता था। अब ऐसा नहीं होगा। अब सामान्य प्राइवेट लाइसेंस पर ये वाहन चलाए जा सकेंगे।

इस रिपोर्ट में ट्रांसपोर्ट विशेषज्ञ अनिल चिकारा के हवाले से बताया गया हैः

“आदर्श स्थिति में एक कैब 6 प्राइवेट कार को रिप्लेस करती है और एक ऑटोरिक्शा एक दर्जन कारों का विकल्प है। चूंकि यह चलते रहते हैं, इसलिए पार्किंग स्पेस भी कम चाहिए होता है।”

विशेषज्ञों को यह भी लगता है कि आने वाले समय में सरकार ओला-ऊबर सरीखे ऐप पर आधारिति टैक्सी सेवाओं में प्राइवेट गाड़ियों के इस्तेमाल को मंजूरी दे सकती है। इससे न केवल प्राइवेट गाड़ियों का उपयोग बढ़ेगा, बल्कि सड़क पर भीड़ भी कम होगी।

 

 

कोलकाता सरीखे शहरों में पार्किंग एक विकराल समस्या है। यहां सड़क किनारे खड़े वाहनों के वजह से आम लोगों का चलना-फिरना भी मुश्किल होता है।

 

 

सरकार अगर नीति परिवर्तन करे तो ऐसी गाड़ियों का इस्तेमाल हो सकता है, जिनका लंबे समय तक कोई उपयोग नहीं होगा। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने कार का इस्तेमाल कॉमर्सियल तरीके से करना चाहते हैं, लेकिन अवसर न होने की वजह से ऐसा नहीं कर पाते।

 

 

लंबे समय से इस बात चर्चा होती रही है कि लगातार बढ़ रही कारों की संख्या की वजह से ट्रैफिक मुवमेंट पर असर पड़ रहा है। शहरी यातायात में बाधा में इसे एक बड़ा कारण बताया गया है।

हो सकता है कि इस बदलाव में थोड़ा वक्त लगे, लेकिन शहरों को जाम-मुक्त करने के लिए इस दिशा में कदम उठाया जाना जरूरी है।


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