मुंशी प्रेमचंद के कृत्यों के बिना अधूरा है हिन्दी साहित्य के विकास का अध्ययन

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Updated on 31 Jul, 2018 at 10:49 am

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हिन्दी साहित्य के विकास का अध्ययन महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के कृत्यों के बिना अधूरा है। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की महान विरासत है, जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। यही नहीं, मुंशी प्रेमचंद के द्वारा साहित्य में रखी गई यथार्थवादी परंपरा की नींव व परम्परा ने बाद में दूसरे कथाकारों का मार्गदर्शन किया।

यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक प्रेमचंद के सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़े और इस परम्परा को अक्षुण्ण बनाए रखने का काम किया। मुंशी प्रेमचंद न केवल एक संवेदनशील लेखक थे, बल्कि वह एक कुशल वक्ता और संपादक भी थे। प्रेमचंद से पहले आमतौर पर हिंदी में काल्पनिक और पौराणिक धार्मिक रचनाएं ही की जाती थीं।

प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य को एक नया कलेवर दिया। 33 साल के रचनात्मक जीवन में वह बड़ी साहित्यिक विरासत सौंप गए। हम यहां 20वीं सदी के इस महान कथाकार के जीवन व कर्म से जुड़ी कुछ जानकारियां प्रकाशित कर रहे हैं।

1. प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के नजदीक लमही गांव में हुआ था।

2. वर्ष 1898 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद प्रेमचंद शिक्षक के रूप में नियुक्त किए गए।

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3. शिक्षक की नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। वर्ष 1910 में उन्होंने इंटर पास किया और १९१९ में बीए।

4. उनकी पहली कहानी वर्ष 1915 में सरस्वती पत्रिका में दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुई। इस कहानी का नाम था ‘सौत’।

5. उनकी पहली रचना मामा के ऊपर लिखी गई व्यंग्य कृति थी। हालांकि, प्रेमचंद का पहला प्रकाशित उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ को माना जाता है। यह उर्दू में लिखी गई थी।

6. प्रेमचंद के उपन्यास ‘सोजे-वतन’ के देश प्रेम पर आधारित होने की वजह से अंग्रेजी सरकार ने उन्हें इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी थी। इस उपन्यास की प्रतियां जब्त कर नष्ट कर दी गईं।

7. वर्ष 1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

8. कुछ महीने बाद ही वह मर्यादा पत्रिका के संपादक बने। बाद में छह साल तक माधुरी पत्रिका का भी संपादन किया।

9. वर्ष 1930 में ऐतिहासिक ‘हंस’ पत्रिका की शुरुआत प्रेमचंद ने की। वर्ष 1932 में ‘जागरण’ नामक एक अन्य साप्ताहिक का प्रकाशन भी शुरू हुआ।

10. मुंशी प्रेमचंद ने वर्ष 1936 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की।

11. प्रेमचंद ने वर्ष 1934 में प्रदर्शित हिन्दी फिल्म मजदूर की पटकथा भी लिखी थी। इस दौरान वह अजंता सिनेटोन कंपनी में नौकरी कर रहे थे। उन्हें बंबई रास नहीं आया।

12. प्रेमचंद ने अपने जीवनकाल में 300 से अधिक कहानियां और करीब एक दर्जन उपन्यास लिखे। इसके अलावा उन्होंने कई लेख, नाटक भी लिखे थे।

13. उनकी साहित्यिक कृतियां सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में धूम मचाई है। उनकी कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

14. ‘गोदान’ को मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना माना जाता है। ‘कफन’ उनकी आखिरी कहानी रही थी।

15. प्रेमचंद आर्य समाज से प्रभावित थे। उन दिनों आर्य समाज बड़ा सामाजिक और धार्मिक आंदोलन था। प्रेमचंद ने विधवा विवाह का समर्थन किया।

16. ‘सोजे वतन’ लिखने तक वह धनपत राय के नाम से लिखते थे। अजीज दोस्त मुंशी दयानारायण निगम की सलाह पर बाद में वह प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।

17. प्रेमचंद अपना आखिरी उपन्यास मंगलसूत्र पूरा करने से पहले ही चल बसे थे। इस उपन्यास को उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया।

18. साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ कहकर संबोधित किया था और इस उपाधि से विभूषित किया था।

19. लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया।

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