एक लाइब्रेरी बदल रही है सरकारी स्कूलों की तस्वीर, एनिमेटेड विडियो की लगती है क्लास

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Updated on 23 Jan, 2017 at 9:48 pm

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‘प्रयोग’ सिर्फ़ एक गैर सरकारी संगठन नहीं है, बल्कि बिहार के गोपालगंज जिले के ग़रीब लोगों के लिए शिक्षा का उजाला भी है। यह संस्था इस जिले के ग्रामीण इलाक़ों में एनिमेटेड विडियो का उपयोग यहां के बच्चों को शिक्षित करने में इस्तेमाल कर रही है। ‘प्रयोग’ का मकसद ग्रामीण इलाक़े के बच्चों को उच्च तकनीक से रूबरू कर उन्हें साक्षर बनाना है।

कई अनुसंधान और शोध द्वारा यह साबित हो चुका है कि बच्चों को वो चीज़ें ज़्यादा याद रहती हैं, जिन्हें उन्होंने देख कर या दृश्यों के माध्यम से समझा हो। उसी आधार पर हम कह सकते हैं कि मानव मस्तिष्क की भूमिका एक प्रोसेसर या गुरू की तरह होती है। यह स्वाभाविक है कि जिन चीज़ों को हम देख सकते हैं, उसकी जानकारी लंबे वक़्त तक आसानी से याद रखते हैं। दुर्भाग्य से अब शिक्षा प्रणाली मौखिक सामग्री जैसे किताबें, टेबल्स आदि पर मुख्य रूप से निर्भर करती है। इस वजह से हमारी पारंपरिक शिक्षा जिसमें जोर दृश्यों, चित्रों को देखकर सीखने की प्रक्रिया पर दिया जाता है, अब शिक्षण प्रणाली से गायब होती जा रही है।

‘प्रयोग’ बिहार में एक स्वयंसेवी संस्था है जो पटना से 200 किलोमीटर दूर गोपालगंज जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षा को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ नई दिशा दिखाने की पहल कर रहा है। इस पहल का नाम ‘टून मस्ती’ है। ‘टून मस्ती’ के इस प्रयोग से इन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के लिए ऑडियो-विज़ुअल तकनीकी उपलब्ध कराया जा रहा है।

टून मस्ती की शुरुआत अर्न्स्ट एंड यंग फाउंडेशन द्वारा की गई थी। इसके तहत जानकारीपूर्ण एनिमेटेड वीडियो का एक शिक्षण मॉड्यूल एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के कक्षा 1 से कक्षा 5 तक के छात्रों के लिए तैयार किया गया था। यह प्रयास उबाऊ शिक्षा मॉड्यूल से छुटकारा दिलाकर इसे सुलभ और रोचक बनाने के लिए किया गया था। 

आईआईटी बंबई के पूर्व छात्र सूर्य प्रकाश राज ने वर्ष 2016 में बिहार के ग्रामीणवासियों में पढ़ने का रुझान बढ़ाने के लिए ‘प्रयोग’ की शुरुआत की थी। स्नातक होने के बाद, सूर्य ने ‘प्रयोग’ शुरू करने से पहले कई एनजीओ के साथ काम किया था। आज वह एक पेशेवर सलाहकार हैं। कई स्कूलों का दौरा करने और छात्रों के साथ बातचीत के बाद उन्होंने पाया कि शिक्षा की कमी के कारण लगभग हर समस्या का सामना ग्रामीण भारतीयों को करना पड़ रहा है। इसके बाद सूर्य ने अपने गृहनगर गोपालगंज के गांव में एक ‘सामुदायिक पुस्तकालय’ की शुरुआत की और जल्द ही यह शुरुआत एक बड़ी शैक्षिक पहल में बदल गई है। सूर्य ग्रामीण इलाओं में शिक्षा से संबंधित समस्याओं और इस पहल के बारे में बताते हैंः


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“जब दूरदराज के ग्रामीण गांवों में शिक्षा की बात आती है तो पता चलता है कि इतनी सारी समस्याएं हैं। वहां योग्य शिक्षकों की कमी है। यहां तक ​​कि जिन सरकारी स्कूलों में योग्य शिक्षक मौजूद हैं वहां अध्यापक और छात्रों के बीच अनुपात इतना अधिक है कि व्यक्तिगत रूप से छात्रों पर ध्यान केंद्रित कर पाना नामुमकिन है। साथ ही वहां पाठ्यपुस्तकों के अलावा पढ़ने के लिए और कोई स्त्रोत नहीं है। इन समस्याओं को समझने के बाद मैने पुस्तकालय के रूप में पहला कदम उठाने का फैसला किया।”

सूर्य बताते हैं कि उन्होंने 2013 में ही पुस्तकालय की स्थापना की। इसके बाद से नियमित तौर पर शाम के वक़्त उन बच्चों के लिए स्पेशल क्लास चलती है, जिनके पास उचित शिक्षा या ट्यूशन उपलब्ध नहीं है।आज ‘प्रयोग’ के शुरू होने के तीन साल बाद बहुत से सरकारी स्कूलों को मदद पहुंची है। इस पहल के तहत इन स्कूलों के परिसर में इस तरह के आधुनिक पुस्तकालयों की स्थापना की जा चुकी है। पुस्तकालयों को व्यवस्थित रूप से संचालन के लिए सूर्य ने चार स्थानीय युवकों को इस पहल से जोड़ रखा है। इन युवकों को ख़ासतौर पर प्रशिक्षित भी किया गया है।

प्रयोग एमआईटी समर्थित ‘ग्लोबल साक्षरता परियोजना’ नामक कार्यक्रम है, जो छात्रों को खुद से सीखने वाले मॉड्यूल प्रदान करता है।

आज प्रयोग के इस शैक्षिक प्रयोग की काफ़ी सराहना हो रही है, जिसकी मदद से ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा के लिए छात्रों का रुझान बढ़ा है। सूर्य प्रयोग के बारे में बहुत उत्तसाहित होकर बताते हैंः

“यह शानदार है! बच्चों को एनीमेशन से प्यार है और यदि वे कार्टून देखकर सीखने में सक्षम हैं, तो इसकी तुलना में कुछ भी बेहतर नहीं है। इसलिए हम गोपालगंज के जिला कलेक्टर से मिले और दो सरकारी स्कूलों में कक्षा 1-5 तक के छात्रों के लिए एक पायलट प्रॉजेक्ट संचालन करने की अनुमति मांगी। हमने 2016 में 300 बच्चों से इसकी  शुरुआत की और आज इसका नतीजा बेहद प्रभावशाली है। हमने आकलन किया है कि इस कार्यक्रम से छात्रों के ज्ञान और प्रतिक्रिया के स्तर में वृद्धि हुई है।”

इस पहल के तहत प्रत्येक स्कूल के एक कक्षा को ‘टून मस्ती’ के पाठ्यक्रम के अनुसार सुविधाओं से लैस किया गया है। वर्तमान में जानकारीप्रद फिल्मों को दिखाने के लिए लैपटॉप का उपयोग किया जाता है। हालांकि, अधिक छात्र होना भी ‘सीखने के इस ख़ास क्लासरूम’ के लिए एक समस्या का कारण है। इस समस्या से निपटने के लिए, प्रयोग पैसे जुटा कर एलईडी टीवी खरीदने की पहल कर चुका है।

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