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कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं; साबित कर दिखाया है प्रदीप ने

Updated on 10 April, 2017 at 10:58 am By

अगर कभी न हार मानने का जुनून हो और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं है। कुछ इसी तरह की मिसाल दी है दोनों पैरों से दिव्यांग कानपुर के प्रदीप ने।

प्रदीप को किसी ने गोलगप्पे बनाने की सलाह दी तो किसी ने कहा मसाले बेचो, लेकिन प्रदीप का सपना कुछ और ही था। जानिए किस तरह दोनों पैरों के बिना प्रदीप ने हासिल की अपनी मंजिल।


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किसी ने खूब कहा है:

“मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है,
हर पहलू ज़िन्दगी का इम्तेहान होता है।
डरने वालो को मिलता नहीं कुछ ज़िन्दगी में,
लड़ने वालो के कदमो में जहां होता है।”

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इस पंक्तियों को सच साबित करने वाले प्रदीप दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। प्रदीप का जन्म कानपुर के बेहद गरीब परिवार में हुआ। प्रदीप के पिता टिक्की-गोलगप्पे की मामूली सी दुकान लगाते हैँ।

प्रदीप बताते हैं:


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“मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो आस-पास के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि आप के दोनो पैर काम नहीं करते हैं, आप गोलगप्पे बनाने में अपने पिता की मदद करना शुरू कर दो।”

लेकिन बचपन से ही जिद्दी प्रदीप ने अपनी कहानी खुद लिखने की ठान ली थी। प्रदीप ने कानपुर से ही अपनी पढ़ाई पूरी की और पॉलिटेक्निक में डिप्लोमा लेने के बाद उनका प्लेसमेंट दिल्ली की एक निजी कंपनी में हुआ।

प्रदीप की कहानी यहीं खत्म नहीं होती यहां दिल्ली पहुंचने के बाद और कई बार उस कंपनी का चक्कर काटने के बाद प्रदीप को उस कंपनी से जवाब मिला कि ‘’आप जैसे लोगों के लिए हमारे यहां सुविधा नहीं है।‘’

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प्रदीप बताते हैं कि वह रो पड़े, उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था, उनके घर वाले उन्हें बार-बार घर वापस आने के लिए कह रहे थे। लेकिन प्रदीप को यह बात स्वीकार नहीं थी कि कोई उन्हें फिर से गोलगप्पे बेचने को कहे।

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तमाम भाग-दौड़ के बाद, कई कंपनियों के चक्कर काटने के बाद एक बड़ी कंपनी में प्रदीप को एक अच्छी नौकरी मिल ही गई और प्रदीप ने यह कहावत एक बार फिर से सच साबित कर दी कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’।

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दोनों पैरों से दिव्यांग प्रदीप ने अपनी कमाई के बलबूते अपने साथ-साथ अपने परिवार को भी गरीबी के दलदल से निकाल लिया।

प्रदीप अपने परिवार के हीरो हैं। उनके 2 भाई और एक बहन है। प्रदीप कहते हैं कि उन्हें यहां तक पहुंचाने में उनके घर वालों का बड़ा योगदान रहा है।

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प्रदीप अपने माता-पिता को अपनी प्रेरणा मानते हैं और कहते हैं कि कोई भी इंसान शरीर से नहीं बल्कि सोच से छोटा-बड़ा बनता है।

प्रदीप जीवन में हताश होकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने वाले युवाओं को सलाह देते हैं कि परेशानियों से हमेशा से भागने के बजाए हमें मजबूती से लड़कर हमेशा के लिए परेशानी को भगा देना चाहिए।

यहां देखिए प्रदीप की कहानी, उन्हीं की जुबानी।


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