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हिन्दी पट्टी में जाति की राजनीति पर विकास भारी!

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2:56 pm 28 Jul, 2017

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हिन्दी पट्टी की राजनीति में लंबे समय से यादवों का वर्चस्व रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक फैले इस विशाल क्षेत्र में करीब ढाई दशक से अधिक समय से यादव नेता अपने तौर-तरीकों से सत्ता पर काबिज रहे। उत्तर प्रदेश में जहां मुलायम सिंह यादव और उनके कुनबे के लोग अधिकतर फैसले लेते रहे थे, वहीं बिहार में लालू प्रसाद यादव ने न केवल जाति की राजनीति को आगे बढ़ाया, बल्कि परिवार की राजनीति प्रश्रय देने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। इन दोनों राज्यों में यादव नेताओं के कार्यकाल में लगभग सभी बातें समान रही हैं। अब करीब तीन महीने पहले उत्तर प्रदेश की सत्ता से समाजवादी पार्टी के बाहर होने और बिहार सरकार से लालू यादव के बेदखल होने से यह संकेत गया है कि लंबे समय से इस इलाके की राजनीति पर अपना दबदबा कायम रखने वाले यादव नेताओं का वर्चस्व खत्म हो रहा है। भारतीय राजनीति में इन दोनों राज्यों का बड़ा महत्व है, क्योंकि यहां 120 लोकसभा की सीटें हैं। राजनीतिक पंडित मानते रहे हैं कि इन दोनों राज्यों में जो राजनीतिक दल बेहतर स्थिति में होंगे, केन्द्र में उनकी ही चलेगी।

ऐसे में यह सवाल जायज है कि मुलायम सिंह यादव या लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी गुजरे जमाने की सफलता को दोहराने में क्यों विफल रहे हैं? लोगों को लुभाने का तिलिस्म अब काम क्यों नहीं कर रहा? क्या अब नए तरह की राजनीति का समय आ गया है?

उत्तर प्रदेश और बिहार के बारे में सर्वविदित तथ्य है कि ये प्रदेश लंबे समय से जातिवादी राजनीति का दंश झेलते रहे हैं। रोजगार व शिक्षा की तलाश में बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हुआ है। जातिवादी राजनीति को प्रश्रय देने वाले नेतागण स्थानीय स्तर पर न तो शिक्षा व्यवस्था को सुधारने में सफल रहे हैं और न ही रोजगार के लिए उन्होंने कुछ किया है। बढ़ रहे अपराध को आमतौर पर राजनीतिक दलों का ही समर्थन मिला हुआ है। बिहार में लालू यादव और गैंगस्टर शहाबुद्दीन का गठजोड़ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


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विकास की राजनीति को दिशा दिखायी जा रही है। इन दोनों राज्यों में राजनीति पर कसी जातिवाद की जकड़न टूटी है। लेकिन हाल के दिनों में जो राजनीतिक घटनाक्रम दिखे हैं, उसको देखते हुए यह कहना श्रेयस्कर नहीं होगा कि सब कुछ पूरी तरह बदल गया है। यादवों का वर्चस्व खत्म होता जरूर दिख रहा है, लेकिन इसमें नए तरह के जातीय समीकरण भी बन रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने जहां अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी राजनीति को साधने की कोशिश की है, वहीं नीतीश कुमार सरीखे मंजे हुए नेता दलित, अति दलित और महादलित कार्ड खेल रहे हैं। जहां तक यादव क्षत्रप मुलायम व लालू की बात है तो ये लंबे समय से यादव-मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर रहे हैं। इन्हें यही जातीय समीकरण सत्ता के केन्द्र में पहुंचाता रहा है, लेकिन अब समय बदल रहा है।

राष्ट्रवाद के लहर पर पहले से ही सवार भाजपा ने न केवल जातीय समीकरण को साधा, बल्कि बड़े पैमाने पर विकास की बात कही है। पार्टी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र की स्वच्छ छवि का भी बड़ा फायदा हुआ है।

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