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इस गांव में बेटी के जन्म लेने पर मनाते हैं उत्सव, बंटती है मिठाइयां

Updated on 4 March, 2017 at 9:20 pm By

भारत में कई ऐसे इलाके हैं, जहां बेटियों को बोझ समझा जाता है, लेकिन इसी देश में एक जगह ऐसी भी है जहां बेटियों के जन्म पर उत्सव मनाया जाता है।

यह स्थान है, राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गांव। इस गांव में अगर बेटी जन्म लेती है तो गांव के लोग 111 पौधे लगाते हैं और उनके फलने-फूलने तक पूरी तरह देखरेख करते हैं। यही वजह है कि गांव के चारों ओर हरियाली छाई हुई है।


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पेड़ को दीमक से बचाने के लिए इसके चारों तरफ घृतकुमारी का पौधा लगाया जाता है। ये पेड़ और घृतकुमारी के पौधे गांववालों की आजीविका के माध्यम बनते हैं।

इस अनूठी पहल से बीते सात सालों में इस इलाके में साढ़े तीन लाख से अधिक पेड़ लगाए जा चुके हैं।

बेटियों के प्रति स्वीकार-भाव धीरे-धीरे पर्यावरण संरक्षण के अभियान का रूप ले चुका है। वहीं, राखी के दिन बेटियां पेड़ों को राखी बांधती हैं। यह यहां रहने वाले लोगों के संकल्प और साहस की ही कहानी हैं, जिनके प्रयासों से बालिका भ्रूण हत्या और बाल विवाह के लिए चर्चित राज्य में बेटियों को जीवनदान मिला। सिर्फ यही नहीं, पेड़-पौधे के लिए तरसता एक बंजर-पथरीला इलाका हरित क्षेत्र में बदल गया।

इस गांव ने बदला लड़कियों को देखने का नज़रिया।

वृक्षारोपण के साथ-साथ बेटी के बेहतर भविष्य के लिए गांव के लोग आपस में चंदा करके 21 हजार रुपए जमा करते हैं और 10 हजार रुपए लड़की के माता-पिता से लेते हैं। 31 हजार रुपए की यह राशि लड़की के नाम से 20 वर्ष के लिए बैंक में फिक्स कर दी जाती है।



लड़की के अभिभावक को एक शपथपत्र पर हस्ताक्षर कर देना होता है कि बिटिया की समुचित शिक्षा का प्रबंध किया जाएगा। उसमें यह भी लिखना होता है कि 18 वर्ष की उम्र होने पर ही बेटी का विवाह किया जाएगा। परिवार का कोई भी व्यक्ति बालिका भ्रूण हत्या में शामिल नहीं होगा। और जन्म के बाद जो पौधे लगाए जाएंगे, उनकी देखभाल की जाएगी।

इस तरह शुरुआत हुई इस परंपरा की।

इस अनूठी परंपरा की शुरुआत तब हुई, जब सरपंच श्यामसुंदर पालीवाल की बेटी की मृत्यु बेहद कम उम्र में हो गई। यह परंपरा 2006 मे शुरू हुई थी, जिसे प्रेम भाव से आज भी बड़े लगन से निभाया जा रहा है। अब तक लाखों पेड़ लगाए जा चुके हैं।

गांव की एक और खासियत है कि पिछले सात-आठ वर्ष में पुलिस में एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है और इसके लिए वर्ष 2004 में पिपलांत्री ग्राम पंचायत को राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है।

बेटियों के लिए समर्पण और प्रेम भाव रखने वाला यह गांव आज भारत में मिसाल बन गया है।


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आपके क्या विचार हैं, इस प्रेरणा देने वाले गांव और पेड़ों को अपने परिवार का हिस्सा मानने वाले यहां रह रहे लोगों के बारे में ?

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