भारत की इन जगहों पर रावण दहन नहीं, होती है दशानन की पूजा

Updated on 19 Oct, 2018 at 1:00 pm

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विजयदशमी के दिन देशभर में जगह-जगह बुराई के प्रतीक रावण का पुतला बनाकर जलाया जाता है, लेकिन हमारे ही देश में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। इस बात में कोई दोराय नहीं है रावण महाज्ञानी ब्राह्मण था, लेकिन अहंकार की वजह से उसका सर्वनाश हो गया। दशहरे के दिन ही श्रीराम ने रावण का वध किया था, इसलिए इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। चलिए, हम आपको बताते हैं किन जगहों पर रावण को राक्षस नहीं, बल्कि भगवान की तरह पूजा जाता है।

 

 

उज्जैन

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के चिखली गांव में भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि रावण को पूजा जाता हैं। यहां लोगों का मानना है रावण की पूजा नहीं करने पर पूरा गांव जलकर राख हो जाएगा।

 

मंदसौर

मध्यप्रदेश के ही एक और जिले मंदसौर में भी रावण को पूजा जाता है। कहा जाता है मंदसौर का असली नाम दशपुर था और ये रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का मायका था। मंदसौर रावण का ससुराल था इसलिए यहां दामाद की तरह रावण का आदर सत्कार और पूजा होती है।

बिसरख

उत्तर प्रदेश के एक गांव बिसरख में रावण का मंदिर बना हुआ है और लोग उसकी पूजा करते हैं। कहा जाता है ये गांव रावण का ननिहल था।

 

बैद्नाथ

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैद्नाथ कस्बे में भी रावण की पूजा की जाती है। मान्यता है रावण ने यहां पर भगवान शिव की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मोक्ष का वरदान दिया था।

अमरावती


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महाराष्ट्र के अमरावती जिले के गढ़चिरौली नामक जगह पर आदिवासी समुदाय रावण की पूजा करते हैं। ये लोग रावण और उसके बेटे को अपना भगवान मानते हैं। इसलिए यहां रावण दहन नहीं होता है।

 

काकिनाड

आंध्रप्रदेश की इस जगह पर भी रावण का मंदिर बना हुआ है। यहां भगवान शिव के साथ रावण की भी पूजा की जाती है।

 

जोधपुर

रावण का एक मंदिर राजस्थान के इस ऐतिहासिक शहर में भी बना हुआ है। यहां एक खास समुदाय के लोग रावण को पूजते हैं और खुद को उसका वंशज मानते हैं।

 

मालवल्ली

ये कर्नाटक के मंडया जिले का एक तालुका है जहां रावण का मंदिर बना हुआ है और लोग एक शिवभक्त के रूप में उसकी पूजा करते हैं।

 

जसवंतनगर

उत्तर प्रदेश की इस जगह पर दशहरे के दिन रावण की आरती उतार कर पूजा की जाती है। उसके बाद रावण के टुकड़े कर दिए जाते हैं और तेरहवें दिन उसकी तेरहवीं भी की जाती है।

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