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भारत के सबसे पुराने मंदिर में है सात्विक बली की परम्परा

Published on 6 January, 2016 at 12:12 pm By

बिहार के कैमूर जिले के अंतर्गत भगवानपुर प्रखण्ड में लगभग दो सौ मीटर ऊंची प्रवरा पहाड़ी के शिखर पर मुण्डेश्वरी माता का प्रागैतिहासिक मंदिर स्थित है। मुंडेश्वरी धाम अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए समूचे विश्व में विख्यात है। मंदिर के आस-पास के इलाके में बिखरे पुरा भग्नावशेषों के आधार पर यह मंदिर 2000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है।


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इस मंदिर को कब और किसने बनाया, यह अब भी रिसर्च का विषय है। वैसे तो दुनिया के सामने यह 19वीं सदी के अंत में आया, जब कुछ गडरिये पहाड़ी के ऊपर गए और मंदिर के स्वरूप को देखा। परन्तु यहां पर पूजा की परंपरा 1900 सालों से अविच्छिन्न चली आ रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है। बड़ी संख्या में भक्तगण यहां दर्शनलाभ के लिए आते रहते हैं। इस देवी धाम की सबसे ख़ास बात यह है की यहां सात्विक यानि रक्तविहीन बली की परम्परा सदियों से जारी है।

प्राचीनता की प्रमाणिकता

मुंडेश्‍वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्‍य आधार वहां से प्राप्‍त एक ख़ास शिलालेख है। संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखित इस शिलालेख में महाराज उदयसेन का ज़िक्र है। इसे खोज के दौरान दो टुकड़ों में प्राप्त किया गया था। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में प्राप्त किया गया। फिलहाल शिलाखंड कोलकाता स्थित इंडियन म्‍यूजियम में सुरक्षित है। परन्तु यह शिलालेख भी मंदिर की प्राचीनता को सही-सही दर्शाने में नाकाम रहा है।

इस शिलालेख को पहली बार 1908 में प्रोफेसर आर. डी. बनर्जी ने बांचा था। जिन्होंने इसे हर्षवर्धन के काल से जोड़ते हुए इसके लिखने का समय 636 ईसवी निर्धारित किया था। परन्तु मशहूर एन. जी. मजूमदार ने शिलालेख का गहन अध्ययन करने इसे गुप्तकाल का शिलालेख माना। परन्तु इतना प्रमाणित हो चुका है की यह नारायण देवकुल (विष्णु) के मंदिर का एक समूह था।

साल 2003 में B.H.U के शोधकर्ताओं द्वारा मंदिर परिसर से महान श्रीलंकाई सम्राट महाराजु दुतिगामिनी (101-77 B.C.) की राजमुद्रा प्राप्त करने के बाद पुरानी मान्यताएं नकार दी गईं। सीलोन के तत्कालीन महाराज दुतिगामिनी ने मुंडेश्वरी की पहाडि़यों पर स्तूप बनवाया था। यानी यह मंदिर उदयसेन से भी पहले का हो सकता है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखने पर स्पष्ट हो जाता है कि मुंडेश्वरी शक्तिपीठ स्थित शिलालेख कुषाणकाल से भी संबंधित हो सकता है। आधुनिक शोधकार्यों के बाद इस शिलालेख का काल 108 A.D. निर्धारित किया गया।

मंदिर में रक्तविहीन सात्विक बली की है परंपरा

मुंडेश्वरी शक्तिपीठ की एक विलक्षण विशेषता यह है कि यहां पशु बलि की सात्विक परंपरा है। यह अहिंसक बलि प्रथा की प्रक्रिया अपने आप में काफी रहस्यमय और आश्चर्यजनक है। बलि के लिए मुंडेश्वरी माता की मूर्ति के सामने बकरे पर प्रमुख पुजारी मंत्रोच्चार कर के अक्षत-पुष्प छिड़कते हैंं और बकरा बेहोश सा होकर शांत पड़ जाता है। इसके बाद दोबारा पुजारी के अक्षत पुष्प छिड़कते ही बकरा दोबारा झूमते हुए जगता है और स्वयं मुख्य द्वार से बाहर चला जाता है।



जगद्जननी माता का ऐसा वात्सल्यमयी स्वरूप अपने आप में दुर्लभ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो माता अपने पुत्रों का रक्त नहीं चाहती, अपितु उनका समर्पण देख उन्हें अभयदान दे आशीष प्रदान करती हैं। मुंडेश्वरी देवी कौन हैं, यह भी एक खोज का विषय है क्योंकि देवी का यह स्वरूप संसार में सिर्फ एक यही है।

अद्भुत शिवलिंग भी है विराजमान

इस शक्तिपीठ में भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है। अपनी रहस्यमयी एवं पारलौकिक प्रभाव के कारण यह शिवलिंग अद्वितीय है। मंदिर के निर्माण क्रम का अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि यह मंदिर पहले एक विष्णु मंदिर था। हालांकि बाद में शैव मत की प्रधानता के कारण में कालांतर में विनितेश्वर (शिव) के रूप को यहां पूजा जाने लगा।

कालांतर में चेर शासकों के शाक्त मत होने से मण्डलेश्वरी (मुण्डेश्वरी) मंदिर में प्रमुखता से पूजी जानें लगीं। एक कथा यह भी है की मां ने इसी पहाडी पर चंड-मुंड का संहार किया था, जिसके कारण उनका नाम मुंडेश्वरी माता हो गया।

समन्वयवाद का आदर्श प्रतीक है यह मंदिर

काल के प्रभाव से ध्वस्त हुए मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह चिरकाल से अब तक यथावत है। गर्भगृह के कोने में मुंडेश्वरी देवी की मूर्ति है, जबकि बीच में अष्टधातु का पञ्चमुखी शिवलिंग हैं। मंदिर के समीप प्रवार घाटी में यत्र-तत्र गणेश, शिव और वैष्णव समुदाय के अन्य देवताओं की कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। पुराताविक अध्ययनों के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि मुण्डेश्वरी मां का मंदिर पूर्णतः श्रीयन्त्र पर निर्मित है।

श्रीयंत्र में सभी देवी-देवता निवास करते हैं, इस कारण अनंत उर्जा प्रवाहिनी शक्तियों के कारण यह मंदिर दिव्य शक्तियों से स्पंदित है। एक गर्भगृह में विष्णु, शिव एवं वैष्णवी देवी की उपासना अद्भुत एवं समन्वयकारी है। इतना ही नहीं, यहां आप बौद्ध काल की कलाकृतियां भी देख सकते हैं। इसे संयोग ही कहा जाएगा की मुंडेश्वरी मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम परिवार है। इस प्रकार यह शक्तिपीठ सभी प्रकार की धार्मिक परम्पराओं के समन्वयीकरण का आदर्शतम स्वरूप है।

मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया जारी है

मुंडेश्वरी शक्तिधाम भारत के ‘पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग’ द्वारा संरक्षित है। इसे यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के लिए प्रयास अनवरत जारी है। 2010 में यहां वर्षों बाद मुंडेश्वरी मंदिर में ‘तांडुलम भोग’ अर्थात ‘चावल का भोग’ के वितरण की परंपरा दोबारा शुरू की गई। शिलालेख के अनुसार 108 ईस्वी में यहां भोग की परंपरा जारी है।


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ASI मंदिर के गुम्बद को भी गुप्तकालीन शैली में पुनः विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहा है। आसपास की बिखरी मूर्तियों के लिए संग्रहालय और श्रद्धालुओं के लिए सीढी और रोपवे की भी व्यवस्था की गई है। नवरात्र में बड़ी तादाद में भक्त गण में मुंडेश्वरी माई के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं।

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