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पाताल भुवनेश्वर की गुफा में वास करते हैं 33 करोड़ देवी-देवता

Updated on 17 December, 2016 at 5:47 pm By

“शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव

पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वर”

: –स्कन्द पुराण मानसखंड 103/10-11

व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं, जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्वर है।

भारत के प्राचीनतम ग्रंथ स्कन्द पुराण में वर्णित पाताल भुवनेश्वर की गुफा आज भी देशी-विदेशी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फुट नीचे है।

मान्यताओं के मुताबिक, इसकी खोज आदि शंकराचार्य ने की थी। यहां केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के दर्शन भी होते हैं। पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हों। यह पवित्र व रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है।


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मान्यता है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं ने अपना निवास स्थान बना रखा है।

 पाण्डवों ने यहां खेला था चौपड़

दावा किया जाता है कि इस गुफा को भगवान शिव ने बनाया था। जिस गुफा में 33 कोटि देवी देवता वास करते हो, उस गुफा की अलौकिक छटा का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। इस रहस्मयी गुफा में 92 फुट तक नीचे जाना आसान नहीं है। 82 संकरी छोटी-मोटी तेडी-मेडी सीढ़ियाँ आपको गुफा के गर्भ तक ले जाती हैं, जो किसी रोमांच से कम नही है।

सीढ़ियां ख़त्म होने पर 160 मीटर में फैली सराबोर गुफा, आस्था के महासमुद्र समान है। यह भी कहा जाता है कि द्वापर युग में पांडवों ने यहां चौपड़ खेला था।

patal bhuneshwar

 शेषनाग का निवास स्थान

सीढ़ियां ख़त्म होते ही शेषनाग जी के दर्शन होते हैं, जो विशेष आकृति में अपना फन फैलाए हुए हैं। मान्यता है कि शेषनाग जी ने यहां पृथ्वी को अपने फन पर उठाया था। यहां शेषनाग के रीढ़ की हड्डियां भी दिखती ही हैं, साथ ही उनकी विष की थैली के भी दर्शन होते हैं। यह दृश्य किसी अजूबे से कम प्रतीत नहीं होता।

patal bhuneshwar

 राजा परीक्षित और तक्षक सर्प का वर्णन

शेषनाग के गर्भ स्थान पर हमें एक हवन कुंड दिखता है। वही हवन कुंड, जिसके बारे में एक पौराणिक कथा है कि इस हवन कुंड में राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जनमेजय ने ब्रह्मांड के समस्त सर्पो के विनाश के लिए यहां यज्ञ कराया था।

पौराणिक कथाओं और हिंदू आस्थाओं के अनुसार एक ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि उनकी मौत सर्प दंश से होगी। इस वजह से इस हवन कुंड में उन्होंने यज्ञ शुरू किया। एक-एक कर सारे सर्प आकर हवनकुंड में समाने लगे, लेकिन तक्षक नामक सर्प आकर इसी गुफा में छुप गया। तक्षक एक फल में समा गया और बाद में राजा परीक्षित को डंस लिया। राजा परीक्षित की इस वजह से मौत हो गई।

ब्रह्मा के हंस वाली मूर्ति के होते हैं दर्शन



मानस खंड 103 अध्याय के श्लोक 275 के अनुसार कामधेनु गाय का स्तन भी गुफ़ा की छत पर देखा जाता है, जिससे वृषभेश के ऊपर सतत दुग्ध धारा प्रवाहित होती रहती है। मान्यता है कि कलयुग में अब इससे पानी टपक रहा है। कुछ और आगे बढ़ने पर हमें ब्रह्मा के हंस की टेड़ी गर्दन वाली मूर्ति के दर्शन होते हैं। पुराणो के अनुसार इस हंस को शिव ने घायल कर दिया था, क्योंकि उसने वहां रखा अमृत कुंड जूठा कर दिया था।

ब्रह्मा, विष्णु व महेश की मूर्तियां साथ-साथ स्थापित हैं। परंतु आश्चर्य कि बात यह है कि छत के उपर एक ही छेद से क्रमवार पहले ब्रह्मा फिर विष्णु फिर महेश की इन मूर्तियों पर पानी टपकता रहता है। अब इसे प्रकृति की देन कह लें या स्वयं प्रभु की महिमा आपको सोचने के लिए ज़रूर मजबूर कर देगा।

 चारो धाम के दर्शन एक ही स्थान पर

अगर चारो धाम के दर्शन एक ही स्थान पर हो जाएं, तो इससे बड़ी आस्था की बात और क्या हो सकती है। इस गुफा में भगवान केदारनाथ के दर्शन किए जा सकते हैं। ठीक उनके बगल में ही बद्रीनाथ विराजमान हैं। सामने बद्री पंचायत बैठी है, जिसमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरुड़ शोभायमान हैं। बद्री पंचायत के ऊपरी तरफ बर्फानी बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बड़ी-बड़ी जटाएं फैली हुई हैं।

कहा जाता है कि यह भगवान शिव की जटाएं हैं। यही नहीं, आपको काल भैरव की जीभ के दर्शन भी यहां हो जाएंगे। ऐसा माना जाता है कि जो भी मनुष्य काल भैरव के मुंह से गर्भ में प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए, उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

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भगवान गणेश के शीश विच्छेदन की पौराणिक मान्यता

यही गुफा हमें एक और पौराणिक मान्यता से अवगत कराती है। मान्यता जो जुड़ी है भगवान गणेश के शीश विच्छेदन से। पुराणों के अनुसार अपने पुत्र गणेश से क्रोधित होकर भगवान शिव ने उनके शीश को धड़ से अलग कर दिया था। मान्यता है कि आदि गणेश का कटा शीश यहीं पर रखा गया था।

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गणेश के कटे हुए शीश के उपर अष्टदल कमल का फूल है। कहा जाता है कि इस कमल के फूल से तब तक अमृत का छिड़काव किया गया, जब तक आदि गणेश के लिए हाथी के शीश का प्रबंध नही कर लिया गया। आज भी उस कमल के फूल की पंखुड़ियों से गणेश भगवान के उपर जल गिरता रहता है। अचरज की बात यह है कि इस फूल के आसपास कोई पानी का स्रोत नहीं है। यह किसी चमत्कार से कम नही है।

 कलयुग के समाप्ति को दर्शाती पिंड

इस अलौकिक गुफा में युग-युगांतर का भविष्य भी समझा जा सकता है। अगर यहां के पुजारी के कथन को सत्य मानें तो एक स्थान पर चार प्रस्तर खंड मौजूद हैं। इन चार प्रस्तर खंडों का तात्पर्य चार युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग से है।

कहा जाता है कि पहले तीन प्रस्तर खंडों में कोई परिवर्तन नहीं होता। जबकि कलयुग का पिंड लम्बाई में अधिक है और उसके ठीक ऊपर गुफ़ा से लटका एक पिंड नीचे की ओर लटक रहा है। ऐसा मानना है कि पिंडों के मिल जाने पर कलयुग समाप्त हो जाएगा।


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स्कन्दपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। मेरी राय से यह पावन स्थल इस जगत के लिए एक आशीर्वाद है। वहां जा कर हम इस सृष्टि के चमत्कार से तृप्त हो सकते हैं।

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