…और इस तरह यह पाकिस्तानी गांव बन गया भारत का हिस्सा

9:10 am 3 Aug, 2017

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वर्ष 1947 में आज़ाद हिंदुस्तान के साथ ही पाकिस्तान बनने से सरहदों व लोगों का बंटवारा हो गया। आजादी के कुछ साल बाद वर्ष 1971 में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्ष 1971 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई जिसके बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ था, उसमें भारत के हिस्से एक ऐसा गांव आ गया, जो कभी पाकिस्तान में शामिल था।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह गांव हिंदुस्तान के जम्मू-कश्मीर हिस्से के करीब था। बंटवारे के समय जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाक़े का तुरतुक गांव पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। सरहद पर होने की वजह से इस गांव में बाहर के लोगों का आना मना था, जिसकी वजह से यह गांव दोनों देशों से एक हद तक कटा हुआ था। किसी समय सिल्क रोड से जुड़े हुए इस गांव से चीन, रोम और फ़ारस तक व्यापार होता था।

लद्दाख के करीब होने की वजह से इस गांव में मुस्लिम आबादी होने के बावजूद बौद्ध धर्म का असर साफ़ देखा जा सकता है।

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इस गांव को भारत में मिलाने का श्रेय कर्नल रिनचेन को जाता है, जो इसी गांव के पास के रहने वाले थे। वह वर्ष 1971 के दौरान यहां पहुंचे और उन्होंने तुरतुक के लोगों को समझाया कि भारत का हिस्सा बनने पर वो लोग ज़्यादा सुरक्षित रहेंगे। कर्नल रिनचेन के भरोसे पर इस गांव के लोगों ने भारत में शामिल होने का निर्णय लिया और बंटवारे के वक़्त तुरतुक के मस्जिदों में शरण ली।



तुरतुक गांव भारत का हिस्सा तो बन चुका है, लेकिन इसकी हालत भी देश के अन्य गांवों की तरह ही खराब है। डिजिटल युग में इस गांव के लोगों के लिए इंटरनेट और फोन जैसी चीज़ें भी बिल्कुल नई हैं।

वैसे यह गांव लद्दाख के करीब है, इसलिए यहां पर्यटक आने लगे हैं। अपनी ख़ूबसूरती और शांत वातावरण की वजह से ये लोगों की पसंद भी बन चुका है।


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