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क्या पाकिस्तानी सेना को कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ से कुछ सीखने की ज़रूरत है?

1:33 pm 6 Sep, 2017

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सुनील खिलानी द्वारा लिखित ‘कौटिल्य: द रिंग ऑफ़ पॉवर’, नॉन-फिक्शन का एक अद्भुत नमूना है। यह किताब इतिहास के धार्मिक तथा अध्यात्मिक साहित्य को किसी भी प्रकार की चुनौती दिए बगैर तब के शासनकाल और शासन कला की एक साफ़ तस्वीर दिखाती है। यह किताब कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर आधारित है। कौटिल्य यानी चाणक्य अर्थशास्त्र के वह विद्वान थे जिनकी मदद से चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में नंद को हराकर अपना साम्राज्य स्थापित किया था।

सुनील खिलानी जो इंडिया इंस्टिट्यूट एट किंग्स कॉलेज के डायरेक्टर हैं, ने इस किताब में अर्थशास्त्र को माध्यम बनाकर भारतीय मस्तिष्क की कुटिलता का ज़िक्र किया है। जब शासन कला, आर्थिक नीति और सैन्य रणनीति से सुसजज्जित अर्थशास्त्र का पहली बार वर्ष 1905 में शम्शास्त्री द्वारा अंग्रेजी में अनुवाद किया गया तो पूरी पश्चिमी दुनिया चकित रह गई थी।

जर्मनी के जाने-माने विचारक मैक्स वेबर ने कहाः

“इस प्राचीन भारतीय साहित्य ने कट्टरपंथी साम्राज्य ‘द प्रिन्स’, मकाइवली द्वारा प्रसिद्ध 16वीं शताब्दी की किताब, को  सपाट कर दिया है।”

इस किताब में कौटिल्य और उनके विचारों को इस प्रकार से बताया गया है कि इसने रेडिट पर एक बड़ी बहस का रूप ले लिया। जब एक रेडिट यूजर ने पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाते हुए टिप्पणी की कि अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत को टुकड़ों में बांटने की सोच रहा है, तो प्रत्येक पाकिस्तानी सैनिक को कौटिल्य के अर्थशास्त्र के बारे में जानने की जरूरत होगी। बस इतना ही कहने की देर थी कि देखते ही देखते रेडिट तीखी टिप्पणियों का अखाड़ा बन गया। कई पाकिस्तानी लोग इस बहस का हिस्सा बन गए।

पहली बार टिप्पणी के बाद एक पाकिस्तानी नागरिक का जवाब।


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एक और व्यक्ति जिसे शायद भारत में बनने वाले व्यंजनों की कोई जानकारी नहीं है, ने अपना ही मज़ाक बना लिया।

हालांकि इस चर्चा में कुछ समझदारी की बातें भी हुईं।

अर्थशास्त्र में  कौटिल्य ने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह के जीवन में सही तरह से तालमेल बनाने के कई नियम और उद्देश्य बताए हैं। इसके अलावा, कौटिल्य ने अपनी किताब में धोखाधड़ी और विनियोग के चालीस रूपों का उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार का भी उल्लेख किया है, जिसका सामना सरकार को करना पड़ता है।

यह किताब उस समय की आर्थिक नीति और सैन्य रणनीति का आधार रही है और आज भी दुनिया को इससे बहुत कुछ सीखने की ज़रुरत है।

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