ये है पाकिस्तान की पहली महिला टैक्सी चालक, कट्टर देश में बनी मिसाल

9:00 am 8 Aug, 2018

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महिलाओं की ज़िंदगी कहीं आसान नहीं होती और यदि वो अकेली हैं तो मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती है। भारत जैसे पुरुषप्रधान देश में भी अकेली महिला की ज़िंदगी आसान नहीं होती, लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में तो महिलाओं की ज़िंदगी बदतर है।

पाकिस्तान की पुरानी सोच

हमारे देश में फिर भी कुछ प्रतिशत ही सही महिलाएं आत्मनिर्भर हैं और उनके प्रति सोच भी में भी थोड़ा बदलाव आ रहा है, मगर पाकिस्तान इस मामले में आज भी पूरी तरह से रुढ़ीवादी है। ऐसे में यदि को महिला लीक से हटकर कोई काम करती है तो वाकई काबिले-तारीफ है।

 

पाकिस्तान की पहली महिला टैक्सी चालक (Pakistan first woman taxi driver)

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एक ऐसी ही पाकिस्तानी महिला हैं जाहिदा काज़मी जिन्होंने पुरुषवादी सोच वाले पाकिस्तान में वो काम किया जो अब तक सिर्फ पुरुष ही करते आए थें। जाहिदा पाकिस्तान की पहली महिला टैक्सी ड्राइवर हैं।

 

 

पाकिस्तान की पुरुषवादी सोच पर वह कहती हैं कि “अगर मैं घर छोड़कर सोचती हूं कि मैं एक महिला हूं तो यह काम नहीं होगा। पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए, मुझे एक आदमी की तरह होना था।”

 

 

जाहिदा ने 1992 में पहली बार पाकिस्तान की सड़कों पर टैक्सी चलाकर ये साबित कर दिया था कि औरतें कमज़ोर नहीं होती, बल्कि पुरुष अपने फायदे के लिए उन्हें हमेशा कमज़ोर बनाने की कोशिश करता है। जाहिदा की दो शादियां हुईं, लेकिन दोनों ही पति की मौत हो गई। विधवा जाहिदा अब 56 साल की हो चुकी हैं और अपनी सात साल की बेटी की परवरिश के लिए वो आज भी रावलपिंडी की धूलभरी सड़कों पर टैक्सी चला रही हैं।

 

 

पाकिस्तान में औरतों की स्थिति बहुत दयनीय है। इस बारे में जाहिदा कहती हैं “मेरा जीवन बहुत बड़ा संघर्ष है। पाकिस्तान में एक महिला होना किसी पाप से कम नहीं है। पुरुषों के लिए पाक में जीना आसान है। लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि एक महिला कितनी मेहनत करती है, महिलाओं के काम को पुरुषों के काम की तरह अहमियत नहीं मिलती।”

 

 

जाहिदा जैसी जुझारू महिलाएं उन हजारों पाकिस्तानी लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं, जो दबाव में आकर अपने सपनों, अपनी चाहत को दिल में ही दफन कर लेती हैं। जाहिदा न सिर्फ टैक्सी चलाती है, बल्कि कुछ गलत करने पर पुरुष टैक्सी ड्राइवरों से झगड़ने से भी पीछे नहीं हटती।

जाहिदा महिलाओं को प्रेरणा देती है कि अपने हक और अधिकार के लिए लड़ने में कोई बुराई नहीं है।


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