पाकिस्तान में शुरू हुई भगत सिंह को न्याय दिलाने की कवायद, लाहौर हाईकोर्ट में केस दर्ज

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Updated on 11 Jul, 2016 at 1:42 am

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भगत सिंह की फांसी के 85 साल बाद उन्हें इन्साफ दिलाने की कवायद शुरू हो गई है। महान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को निर्दोष साबित करने की इस कवायद में पाकिस्तान सामने आया है। इसी कड़ी में लाहौर हाई कोर्ट में ब्रिटिश पुलिस अफसर सॉन्डर्स के मर्डर केस में सुनवाई शुरू हुई।

भगत सिंह को सॉन्डर्स के मर्डर केस में सजा सुनाते हुए ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च, 1931 को फांसी दे दी थी। दरअसल, फांसी पहले 24 मार्च, 1931 को दी जानी थी लेकिन देश में लोगों के बढ़ते रोष को भापकर, अंग्रेज सरकार ने एक दिन पहले ही भगत सिंह समेत सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी।

Bhagat singh death certificate

भगत सिंह का जारी किया गया मृत्यु प्रमाण पत्र flickr


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भगत सिंह पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ साजिश रचने का आरोप तय किया गया था। इस मुक़दमे की नए सिरे से सुनवाई के लिए ‘भगत सिंह मेमोरियल फ़ाउंडेशन’ नाम के एक संगठन ने याचिका दायर की है।

‘भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन’ के चेयरमैन और याचिकाकर्ता वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने इस मामले में नवंबर में लाहौर हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए याचिका दाखिल की थी। इसमें कुरैशी ने सवाल उठाया कि पहले भगत सिंह को आजीवन कैद की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में मामले को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया और उन्हें फांसी दे दी गई।

लाहौर हाई कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह की फांसी का मुक़दमा दोबारा खोलने के लिए डिविजन बेंच बनाने का आदेश दिया है। इस याचिका पर सुनवाई के लिए लाहौर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस इजाजुल अहसान ने जस्टिस खालिद महमूद खान की अगुआई में कम से कम पांच सदस्यों वाली डिविजन बेंच बनाने के कुरैशी के आवेदन को स्वीकार कर लिया है।

कुरैशी ने कहा कि कानून के अंतर्गत सिर्फ बड़ी बेंच ही भगत सिंह को दी गई फांसी की सजा को बदल सकती है। गौरतलब है कि भगत सिंह को मौत की सजा तीन सदस्यों वाली डिविजन बेंच ने सुनाई थी। यही कारण है कि बड़ी डिविजन बेंच की मांग रखी गई।

1928 में ब्रिटिश अफसर सॉन्डर्स की हुई हत्या की FIR की ओरिजिनल कॉपी, 2014 में लाहौर पुलिस ने उपलब्ध कराई थी। जिसमें भगत सिंह समेत, राजगुरु, और सुखदेव के नाम नहीं थे। जबकि इसी मामले में भगत सिंह को फांसी दे दी गई। यह मामला IPC के सेक्शन 190, 201, 302 के अंतर्गत दर्ज किया गया था।

Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev

(बाएं से दाएं) भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव licdn

जब इस मामले में कुरैशी की ओर से दाखिल की गई याचिका में देरी को लेकर बात की गई तो कुरैशी कहते हैं:

“इस केस में बहुत सारे पेंच थे। हमने शहीद भगत सिंह केस की एफ़आईआर निकलवाई। उसमें न भगत सिंह का नाम है, न राजगुरु का, न सुखदेव का। ये तीनों बेगुनाह थे, जिन्हें फांसी पर लटका दिया गया। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका इंसाफ़ क्या इंसाफ़ था।”

rajguru,bhagat singh, sukhdev

याचिकाकर्ता कुरैशी, भगत सिंह के साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ लड़कर उन्हें इंसाफ दिलाना चाहते हैं। उनका कहना है कि जब ट्राइब्यूनल के स्पेशल जज ने भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई, तब इस मामले में बहुत से गवाहों की गवाही लेना भी मुनासिब नहीं समझा गया। बल्कि भगत सिंह के वकील को भी अपनी दलीलें पेश करने का मौका तक नहीं दिया गया। उनका कहना हैः

“साढ़े चार सौ गवाहों को सफ़ाई का मौक़ा ही नहीं दिया गया। न तो क्रॉस एक्ज़ामिनेशन की इजाज़त दी गई। ये कैसा इंसाफ़ वो हमें देकर गए है?”

bhagat singh

इस मामले को लेकर राशिद क़ुरैशी की मांग है कि ब्रिटेन भगत सिंह के साथ हुए इस अन्याय को लेकर माफ़ी मांगे और साथ में उनके परिजनों को मुआवज़ा भी दे।


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