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नोटबंदी के एक साल, जानिए क्या हुआ नफा-नुकसान !

Published on 8 November, 2017 at 1:18 pm By

आज से ठीक एक साल पहले 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाटकीय रूप से यह घोषणा की थी कि आधी रात से क़रीब 90 प्रतिशत नोट बेकार हो जाएंगे। इस पहल को ग़लती से ‘नोटबंदी’ कहा गया। इसके तहत 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर कर दिया गया था। इसकी जगह 500 और 2,000 रुपए के नए नोटों को जारी किया गया। तकनीकी तौर पर देखें तो ये ‘नोटबंदी’ नहीं, बल्कि ‘नोटबदली’ थी, जिसका असर आज एक साल होने के बाद भी देखने को मिल रहा है।


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आठ नवंबर 2016 को अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित करते हुए नोटबंदी के फ़ैसले के पीछे तीन कारण गिनाए थे- काले धन को समाप्त करना, जाली नोटों की समस्या को हल करना और ‘आतंकवाद’ के आर्थिक स्रोतों को बंद करना।

आज जब नोटेबंदी को सफल बताते हुए सरकार जश्न मानने की तैयारी कर रही है, वहीं तमाम अर्थशास्त्री, विशेषज्ञ और विपक्ष नोटबंदी को बुरी तरह फेल मान रहे हैं। इसलिए आइए देखते हैं एक रिपोर्ट कि ‘नोटबंदी पर कहां से चले, कहां आ गए हम’।

नोटबंदी से नहीं समाप्त हुआ काला धन!

नोटबंदी का इतना बड़ा फ़ैसला लेने के पीछे बुनियादी समझदारी यह थी कि काले धन का मतलब नगदी से है। इसलिए ये माना गया कि पुरानी करेंसी को अर्थव्यवस्था में चलन से हटाते ही काला धन खत्म हो जाएगा। दरअसल, यह अंदाजा ही गलत था। आज जब बैन की गई करंसी का 90% से ज़्यादा नोट बदले जा चुके हैं इससे साफ हो चुका है कि काला धन पकड़ना तो दूर इसके उलट  नोटबंदी ने काले धन को सफेद करने का रास्ता दिखा दिया।

काले धन के सफ़ाया के लिए बुनियादी ज़रूरत इस बात की थी कि काली कमाई के स्त्रोत को पहले बंद किया जाता। नगदी सोख लेने का ये मतलब हरगिज नहीं होता कि नशीले पदार्थों का कोई तस्कर अपना धंधा बंद कर देगा या अध्यापक ट्यूशन पढ़ाना छोड़ देगा या वह इसकी कमाई सरकार को बताएगा। इसलिए सिस्टम में चलन से हटा ली गई काली नगदी दोबारा पैदा हो जाना लाजिमी सी बात है।

जाली नोटों पर शिकंजा कसने का तर्क भी गुमराह करने वाला



नये नोटों को सिस्टम में लाने की सरकार की यह मंशा थी कि नोटेबदली से भारी मात्रा में चलन में रहे नकली नोटों पर लगाम लग जाएगा, लेकिन यह तर्क भी गुमराह करने वाला प्रतीत होता है। हालांकि, आरबीआई और सरकार यह दावा करती आ रही है कि इन नोटों की नकल करना बहुत मुश्किल है, लेकिन अब ख़बरें मिल रही हैं कि इन नये नोटों के भी जाली नोट पकड़े गये हैं। मतलब यह तर्क भी तर्कसंगत नही लगता।


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नोटबंदी के पक्ष में सरकार का तीसरा तर्क था कि आतंकवादी और चरमपंथी घटनाए थमेँगी, लेकिन मौजूदा हालत देख कर ऐसा प्रतीत होता नहीं है।

‘कैशलेस अर्थव्यवस्था’ अचानक कैसे बन गयी प्राथमिकता

नोटबंदी के कुछ हफ्ते बाद ही सरकार की तरफ से एक तर्क और लाया गया, जिसका ज़िक्र शुरुआती भाषण में नहीं था। विकासशील भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए ‘कैशलेस अर्थव्यवस्था” को महत्वपूर्ण बताया गया। बयान में ये बदलाव तो लाजिमी था, क्योंकि नोटबंदी के पीछे जो तीन कारण गिनाए गए थे, वो कहीं पहुंचते नहीं दिख रहे थे।

लेकिन यह तर्क भी हास्यास्पद सा ही प्रतीत होता है। हालांकि, पहले के मुकाबले कैशलेस ट्रांजैक्शंस में कई गुना वृद्धि ज़रूर दर्ज की गयी है, लेकिन एक ऐसे देश में जहां बुनियादी ढांचे का अभाव है, वहां यह सब कुछ इतनी जल्दी  हो, लगभग नामुमकिन सा प्रतीत होता है।

नोटबंदी कई मामलों में फायदेमंद भी रही

हालांकि, तमाम अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ नोटेबंदी को विफल बता रहे है, लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को फ़ायदा भी पहुंचा है। नोटेबंदी के बाद बैंक नोट से लबालब भरे हुए हैं, जिससे ब्याज दरों में करीब 1 फीसदी गिरावट आई है। इसके साथ ही  कर नीति में हुए सुधार की वजह भी नोटेबंदी बताई जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 में इनकम टैक्स भरने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2015-16 में जहां 2.23 करोड़ लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न भरे थे, वहीं 2016-17 में 2.79 करोड़ लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न भरे।

नोटेबंदी से सरकार को 17 लाख से ज्यादा ऐसे संदेहास्पद खातों का पता चला, जिनके इनकम टैक्स रिटर्न उनके द्वारा नोटबंदी के दौरान बैंकों में जमा किए पैसों के हिसाब से मेल नहीं खा रहे हैं। इनकम टैक्स विभाग ने बड़ी में ऐसे लोगों नोटिस भेजा है।


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तमाम शोध और अध्ययनों से ये बात साफ़ थी कि भारत में कुल काला धन का केवल 6 प्रतिशत ही नक़दी के रूप में मौजूद था। इसके लिए पूरे देश को आर्थिक चोट पहुचा देना  ज़रूर साहसिक फ़ैसला था, लेकिन यह अपने मकसद काले धन को समाप्त करना, जाली नोटों की समस्या को हल करना और ‘आतंकवाद’ के आर्थिक स्रोतों को बंद करने में कामयाब होते नहीं दिख रही है।

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