नॉर्वे में बंद हो गया ‘एफएम’! तो क्या रेडियो युग का अवसान नजदीक है ?

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Updated on 16 Jan, 2017 at 9:49 pm

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किसी भी तकनीकी की सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बात होती है, उसका आधुनिकता से तालमेल बनाए रखना। डिजिटल क्रांति के बाद तकनीकी आज हमारे जेब में आ गई है। उसके बाद भी तकनीकी के मामले में आधुनिकतम या अपडेटेड रहने की चुनौती है। आधुनिकता से तालमेल न बना पाने के कारण ऐसे बहुत से तकनीकी उपकरण हैं, जो एक वक़्त पर हमारे जीवन का अहम हिस्सा तो थे, पर उनकी जगह अब दूसरे आधुनिक तकनीकी ने ले ली। मिसाल के तौर पर वो पुराना कैसेट वाला बाजा हो, चाहे पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क। मोबाइल के आने के बाद ये विलुप्ति की कगार पर हैं।

हाल ही में नॉर्वे ऐसा पहला देश बन गया है, जिसने एफएम रेडियो बंद करने की शुरुआत कर दी है। नॉर्वे में अब एफएम बंद करके उसकी जगह डिजिटल ऑडियो ब्रॉडकास्टिंग (डैब) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।

आपको बता दें ‘डैब’ एक आधुनिक तकनीक है। इस आधुनिक तकनीक से एफएम रेडियो की तुलना में ज्यादा चैनल और बेहतर ऑडियो प्रदान किया जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए प्रसारण में कम बिजली इस्तेमाल होती है।

एनआरके के ब्रॉडकास्टिंग चीफ थोर जेर्मनुंड इरिकसन इसे एक ऐतिहासिक पल बताते हैं। खबर के मुताबिक 11 जनवरी को स्थानीय समयानुसार 11 बजकर 11 मिनट पर देश के उत्तरी हिस्से में नॉर्डलांड काउंटी में एफएफ ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम बंद कर दिया गया। सरकारी रेडियो एनआरके और अन्य निजी ब्रॉडकास्टर्स ने अपना एफएम प्रसारण बंद करके डीएबी से प्रसारण शुरू कर विश्व का पहला देश बन गया जहां एफएम रेडियो बंद कर दिया गया है।

नॉर्वे के अधिकारियों ने एफएम रेडियो को बंद किए जाने के पीछे नॉर्वे के भूगोल और मौजूदा तकनीकी में खामियों को बताया मुख्य वजह।


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आपको बता दें कि नॉर्वे का भूगोल ऐसा है कि छोटे छोटे समुदाय दूर-दराजों इलाकों में बसे हुए हैं। इनके बीच पहाड़ और घाटियां हैं। इस कारण एफएम रेडियो का प्रसारण ज्यादा मुश्किल हो जाता था। एफएम तरंगें पहाड़ और घाटियां पार नहीं कर पातीं और इसका असर क्वॉलिटी पर पड़ता था। यह बात भी नॉर्वे के लिए बड़े बदलाव का कारण होना बताया जा रहा है।

हालांकि, तकनीक में बदलाव की राह में जो रोड़े आए, उनमें लोगों का अनिच्छुक होना भी शामिल है। नॉर्वे के लिए यह फैसला आसान नहीं।

दिसंबर में एक सर्वे में पाया गया कि अधिकतर लोग एफएम रेडियो बंद किए जाने के खिलाफ थे। डेली वीजी नाम की संस्था ने एक हजार से अधिक लोगों से बात करके निष्कर्ष निकाला कि देश के 55.5 फीसदी लोग एफएम छोड़कर डैब अपनाने से नाखुश हैं। 25.1 प्रतिशत लोग इसके पक्ष में थे, जबकि 19.1 फीसदी लोग कोई फैसला नहीं ले सके। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि अब लोगों को रेडियो सुनने के लिए नए डैब रेडियो सेट खरीदने होंगे। या फिर वे कंप्यूटर अथवा स्मार्टफोन से रेडियो सुन पाएंगे। लोगों को अपनी कारों के सिस्टम भी बदलने होंगे। इसको लेकर विरोध भी हुआ, लेकिन अधिकारियों के मुताबिक नई बेहतर तकनीकी अपनाना ही समझदारी है।

सरकारी अनुमान के मुताबिक 2017 से 2019 के बीच ही डैब तकनीक से 2.1 करोड़ डॉलर की बचत होगी। इस फ़ैसले के बाद 13 दिसंबर तक पूरे देश में एफएम रेडियो बंद हो जाएंगे और डैब शुरू हो जाएगा। इसके साथ ही यह प्रश्न भी ज़हन में उठने लगेगा कि क्या वाकई रेडियो के युग का अंत आ गया है?

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