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तो क्या वर्ष 2019 में नरेन्द्र मोदी के वर्चस्व को चुनौती देते दिखेंगे नीतीश कुमार ?

Published on 21 March, 2017 at 12:35 pm By

हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे चौंकाने वाले रहे। चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही है। साथ ही इन नतीजों से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वर्चस्व को चुनौती देना संभव नहीं होगा। हालांकि, विपक्षी राजनीतिक दलों ने एक बैनर के तले आकर महागठबंधन की बात कही है, जिससे भाजपा के वर्चस्व को तोड़ा जा सके। इसके बावजूद संकट यह है कि इस महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर संशय है। क्षेत्रीय क्षत्रप समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी तक धूल-धूसरित हो चुके हैं। एक समय नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने का दावा करने वाले अरविन्द केजरीवाल पंजाब और गोवा में मिली पराजय के बाद बैकफुट पर दिख रहे हैं। शरद पवार और लालू यादव सरीखे नेता सक्रिय नहीं दिख रहे। वहीं, भाजपा के विरोधी दलों पर वाहवाही लुटाने वाली ममता बनर्जी हाल की राजनीतिक परिस्थितियों की वजह से भाजपा के साथ संधि को बेताब दिख रही हैं। उड़ीसा में नवीन पटनायक की स्थिति लगातार कमजोर हो रही है।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो महागठबंधन की कमान अपने हाथ में लेने की दावेदारी जता सकते हैं। इसकी अपनी कई वजहें हैं।


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उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में जनता दल यू के उम्मीदवारों को नहीं उतारा जाना नीतीश के पक्ष में गया है। हालांकि, इसके अलग कारण हैं। राष्ट्रीय लोक दल व अन्य राजनीतिक दलों के साथ सीट बंटवारे के मुद्दे पर बात नहीं बनने की वजह से पार्टी को लगा कि यहां से लड़ना मुफीद नहीं होगा। यह निर्णय नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक तौर पर बेहद अनुकूल साबित हुआ है। हालांकि, इससे पहले वह प्रदेश में कई राजनीतिक सभाओं को संबोधित कर चुके थे।

राजनीतिक विश्लेषक अब मान रहे हैं कि अगर नीतीश कुमार की पार्टी चुनावों का हिस्सा बनी होती तो भी हार तय थी और संभवतः इसे दूरदर्शी नीतीश कुमार ने भांप लिया था। यही वजह है कि उन्होंने ऐन वक्त पर खुद को इससे बाहर रखा और मैदान में न जाकर भी अब जीत का अहसास कर रहे हैं।



विश्लेषक कहते हैं कि अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल की होती तो राजनीतिक परिदृश्य कुछ अलग होता। इसके बाद विपक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में लामबंद हो सकता था। युवा और विकासवादी चेहरा के रूप में अखिलेश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को चुनौती दे रहे होते। वहीं, इसका लाभ राहुल गांधी को भी मिलता। लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में विपक्ष के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जो राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन के नेतृत्व देने का दावा कर सके।

जहां तक अरविन्द केजरीवाल की बात है, तो दिल्ली विधानसभा चुनावों में बंपर जीत हासिल करने के बाद वह राजनीतिक पटल पर एक धूमकेतु की तरह उभरे थे। आम आदमी पार्टी यह दावा करती रही थी कि वह गोवा और पंजाब में सरकार बनाने जा रही है, लेकिन नतीजे उसके पक्ष में नहीं रहे। गोवा में पार्टी को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा है। यहां उसके 40 में से 39 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई, वहीं पंजाब में भी उसे हार का मुंह देखना पड़ा।

कुल मिलाकर देखा जाए तो नीतीश मजबूत स्थिति में हैं। विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक समझ की काट खोजने में निष्प्रभावी है, वहीं नीतीश कुमार के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। वह मोदी की राजनीति को पढ़ने में सक्षम हैं। ममता बनर्जी से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक जब नोटबंदी की घोषणा का विरोध करने में जुटे थे, उस वक्त नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री के इस कदम का स्वागत किया था। चुनाव परिणामों के बाद अब यह साफ हो गया है कि नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं था। लोग इससे खुश थे। इसे सकारात्मक कदम माना गया। यही बात, नीतीश को छोड़कर विपक्ष के किसी भी नेता को समझ में नहीं आई। क्षेत्रीय स्तर पर नीतीश कुमार भले ही राष्ट्रीय जनता दल के साथ सरकार में हों, लेकिन उन्होंने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की महात्वाकांक्षा को साध रखा है। उनकी छवि एक ऐसे नेता के रूप में है जो विकास की बात करता है, भ्रष्टाचार से कोसों दूर है और सार्वजनिक जीवन में निष्कलंक भी।


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कुल मिलाकर देखा जाए तो वर्ष 2019 के चुनावों में पूरा विपक्ष नीतीश कुमार की अगुवाई में उतरेगा और प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनौती पेश करेगा। विपक्ष के पास इसके अलावा और कोई विकल्प है भी नहीं।

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