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‘निर्भया’ फिर भी अकेली रह गई

Published on 18 December, 2015 at 1:20 pm By

हम फिर 16 दिसंबर को मोमबत्तियां ले कर निकले, हो-हल्ला किए। मेट्रो में, चाय की दुकान पर, पान की दुकान पर जितना ज्ञान आता था, उसकी उल्टी कर चैन से सो गए। ‘निर्भाया’ का विषय कल का था। एक कप चाय के साथ अख़बारों में, सोशल मीडिया में या फिर इधर-उधर से। हम फिर से एक नई खुराक खोजने में जुट गए, जिसे हम पचा सकें और अगर नही पचा सके तो फिर इन्ही जगहों पर जाकर उल्टी करके निकाल देंगे।


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Shirish

 

यह क्या हो गया है हमें? क्या निर्भाया की कुर्बानी सिर्फ़ एक दिवस के रूप में मनाने के लिए थी? की हां भाई, इस देश को एक यह दिन मिल गया है, जिस दिन सभ्य समाज का चोला पहने हम भारतीय ‘बलात्कार’ जैसे विषय पर बात कर सकते हैं। और अगर नही कर सकते हैं तो कम से कम परिवार के साथ टीवी पर चुपचाप बैठ कर बलात्कार से भरे क्रियाकर्म तो देख ही सकते हैं।

किसलिए थी कुर्बानी? परिवार में आज भी वह तालमेल या सामंजस्य नही बिठा सके हैं हम कि लड़कियां खुल कर बोल सकें। अपनी आपबीती बता सकें। किस समाज का डर है हमें? ऐसे समाज का जिसको शाम की चाय के साथ बात करने के लिए एक विषय चाहिए?

 


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“दरअसल ग़लती हमारी नही है। सच तो यह है की हम ‘यूज़ टू ‘ हो चुके हैं, हमें आदत हो चुकी है ऐसे घटनाओं को सुनने की, उस पर दुख प्रकट करने की। फ़ेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप पर विचार लिखने की। और अंत में शुक्र मनाना की हमारे साथ ऐसा कुछ नही हुआ और भूल जाने की”।

 



ऐसा नहीं है की मुझे दुख नहीं है, या फिर में आशावादी नही हूं। दरअसल मुझमें आक्रोश है, व्यवस्था के खिलाफ। 3 साल हो चुके हैं 10 से अधिक संसद सत्र निकल चुके हैं। हमारा सिस्टम, एक कानून तक नहीं बना सका, जिसमें एक नाबालिग दोषी को इस जघन्य अपराध के लिए सज़ा दिलवा सके।

 

 

कुछ दिन बाद नाबालिग दोषी अपने इस लोकतंत्र के चुटकुले पर मुस्कुराता हुआ रिहा हो जाएगा। टीवी पर दो पक्षों को बैठा कर मुर्गा युद्ध दिखाया जाएगा और फिर हम चाय के साथ उनका राजनीतिक युद्ध कौशल देखेंगे। इसे सीखेंगे और अंततः थक कर चैनल बदल लेंगे।

 

 

लेकिन कब तक? मुझे बहुत दुःख होता है जब निर्भया की मां-बाप कहते हैं की ‘निर्भया को न्याय नहीं मिला’। सवाल ज़ेहन में आता है की, न्याय की उम्मीद अब किससे करनी चाहिए? सच तो है की अब बदलाव की ज़रूरत है, लेकिन दिवस के रूप में नहीं। मोमबत्तियां जला कर शोक प्रकट करने की नहीं। क्योंकि में जानता हूं कि निर्भया बहुत ही बहादुर थी।उसकी कुर्बानी इसलिए थी की हम अपनी सोच बदलें, लड़कियों के साथ आगे बढ़ें। जो ग़लत हो रहा है, उसका जवाब दें।

 


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हमारा सरोकार यह होना चाहिए की हमारा दुःख हमारी चिन्ता सिर्फ़ एक दिवस या विमर्श बन कर न रह जाए। सोच और कर्म के बीच सार्थक संवाद स्थापित हो, ताकि बहस बदलाव को दिशा दे सके। मैं चाहता हूँ की हमारे दिल में ‘निर्भया’ ज़िन्दा रहे। बहस तब तक चले, जब तक ज़रूरत है।

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