टेस्ला ने 1898 में बना लिया था ‘ड्रोन’, बदल सकता था विश्व युद्ध का परिणाम

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5:29 pm 7 Nov, 2017

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अगर मैं कहूं कि अब हम ड्रोन युग में प्रवेश कर चुके हैं तो ग़लत नही होगा। इस समय दुनिया की हर उस सेना के पास ड्रोन मौजूद हैं, जो आधुनिक हैं और खुद को सशक्त मानती हैं। वहीं, अभी पांच दिन पहले ही यह खबर पढ़ी कि अब राजधानी दिल्ली में सरकार ने ड्रोनों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा है। मतलब, अब जल्दी ही उड़ते हुए ड्रोन ‘होम डिलीवरी’ करते नज़र आएंगे।

युद्ध क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन।

यह आज मुमकिन है। लेकिन सोचिए क्या आज से 120 साल पहले ड्रोन की परिकल्पना आसान थी?

जवाब ज़रूर साधारण रूप से न होगा, लेकिन हम आपको बताते हैं कि अल्टरनेट करेंट (एसी) का इस्तेमाल व्यवहारिक बनाकर धरती के कोने-कोने तक बिजली पहुंचाने वाले महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला ने आज से 120 साल पहले ही ड्रोन डिज़ाइन कर पेटेंट करा लिया था।

मैथ्यू सचरोयर नामक व्यक्ति ने हाल ही में टेस्ला के एक पेटेंट का एक भाग ट्वीट किया था, जिसमें टेस्ला ने संचार, वैज्ञानिक अन्वेषण और युद्ध में उपयोग के लिए मानव रहित वाहनों को विकसित करने के संबंध में पेटेंट दायर किया था।

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आपको बता दें यह पेटेंट 1 जुलाई, 1898 को टेस्ला के द्वारा दायर किया गया। पेटेंट में विस्तृत पाठ और आरेख शामिल हैं, जिससे पता चलता है कि नाव जैसी दिखने वाली मशीन को रिमोट स्रोत से उत्पन्न तरंगों या आवेगों से नियंत्रित किया जाता है। 
टेस्ला पेटेंट में अपने द्वारा डिज़ाइन की गयी मशीन के बारे में बताते हैंः  
“इन मशीने का उपयोग दुर्गम क्षेत्रों के साथ संचार और मौजूदा स्थितियों की खोज के लिए उपयोगी हो सकता है। इसके साथ ही वैज्ञानिक, इंजीनियरिंग या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए भी, लेकिन मेरे आविष्कार का बड़ा मूल्य युद्ध कें परिणाम पर प्रभाव डालना होगा।”

मैथ्यू सचरोयर के इस ट्वीट के बाद फिर से एक बार परिचर्चा शुरू हो गयी है कि अगर टेस्ला अपनी इस खोज पर काम पूरा कर लेते, तो क्या उसके बाद घटित विश्व युद्ध की रूपरेखा भिन्न होती?

टेस्ला पेटेंट में अपने खोज के बारे में स्पष्ट करते हैं कि “उन्होंने खोज कर ली है, जिससे वह रेडियो तरंगों जो पृथ्वी, पानी या वायुमंडल के माध्यम से प्राप्त होते हैं, को अंतरिक्ष के माध्यम से तरंगों के ही द्वारा “जहाजों” को स्थानांतरित कर सकते हैं। आपको बता दें कि रेडियो तरंगों  को पहली बार 1867 में खोजा या अनुमानित किया गया था, लेकिन इसका उपयोग केवल वर्ष 1890 में ही किया गया था। इसलिए उस वक़्त यह नई अवधारणा थी।

वर्ष 1898 में न्यू यॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन मेंटेस्ला में जब टेल्सा अपने इस अविष्कार की प्रदर्शनी की थी, तब लोगों ने इसे महज जादू का नाम दिया था। तब टेस्ला ने कहा था “दुनिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, और नए सच को देखना मुश्किल है।”

आज जब बिना ड्रोन तमाम सेनाएं खुद को अधूरा पाती है, तो सोचिए अगर उस वक़्त टेस्ला ने अपनी इस खोज पर कार्य पूर्ण कर लिया होता तो शायद विश्व युद्ध के न केवल परिणाम अलग होते, बल्कि दशा-दिशा भी भिन्न ही होती।


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