नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े 8 अद्भुत तथ्य

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Updated on 5 Oct, 2015 at 1:44 pm

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शिक्षा के मामले में भारतीय इतिहास प्रखर है। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करीब 2500 साल पहले बौद्ध धर्मावलम्बियों ने की थी। यह विश्वविद्यालय न केवल कला, बल्कि शिक्षा के तमाम पहलुओं का अभिनव केन्द्र था। नालंदा विश्वविद्यालय का काल 6ठी से 13वीं शताब्दी. यानि 700 साल का माना जाता है। ‘नालंदा’ शब्द संस्कृत के तीन शब्दों के संधि-विच्छेद से बना है। ना+आलम+दा। इसका अर्थ है ‘ज्ञान रूपी उपहार पर कोई प्रतिबन्ध न रखना। ‘वास्तविकता में यह वही ‘ज्ञान रूपी उपहार’ है, जिसका अभ्यास भारतीय विद्वान नालंदा में 700 वर्ष पूर्व किया करते थे।

जब नालंदा अपने शिखर पर था, तब विभिन्न देशों के लगभग 10 हजार से अधिक विद्यार्थी यहां रहकर अध्ययन किया करते थे। यही नहीं, यहां शिक्षकों की संख्या 1500 से अधिक थी। यहाँ अध्ययनरत छात्र न केवल बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करते थे, बल्कि उनकी शिक्षा में अन्य संस्कृतियों और धार्मिक मान्यताओं का समावेश था। नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा पूर्ण रूप से नि:शुल्क थी। यह तथ्य ‘नालंदा’, शब्द के आखिरी अक्षर ‘दा’ से पता चलता है, जिसे संक्षिप्त में दान कहेंगे। इसे उपहार के अर्थ में भी लिया जा सकता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि नालंदा विश्वविद्यालय उन भारतीय प्रतीकों में से एक है, जिन पर न केवल भारतीयों को गर्व है, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी निःसंदेह गौरवान्वित होंगी। लेकिन क्या आपको लगता है कि आप नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में काफी कुछ जानते हो? यहाँ हम आपको नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े ऐसे 8 अद्भुत तथ्यों के बारे में बताएंगे, जिनसे शायद आप अपरिचित हों।

1. बौद्धिक और आध्यात्मिक पीढ़ी तैयार करना

नालंदा विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य ऐसी पीढियों का निर्माण करना था, जो न केवल बौद्धिक बल्कि आध्यात्मिक हों और समाज के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकें। इस विश्व-विख्यात विश्वविद्यालय के बारे में आज हम बेहद कम जानकारी रखते हैं। शायद 10 फीसदी भी नहीं। हालांकि, जो जानकारी हमारे पास उपलब्ध है, उसके लिए हमें सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग का आभारी होना चाहिए। इनके यात्रा विवरणों से नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में काफी कुछ पता चलता है।

Buddha


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2. बौद्ध संन्यासियों ने पहले वहाँ एक अध्ययन केंद्र स्थापित किया

नालंदा की स्थापना बौद्ध संन्यासियों द्वारा की गई थी, जिसका मूल उद्देश्य एक ऐसे स्थान की स्थापना करना था, जो ध्यान और आध्यात्म के लिए उपयुक्त हो। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध ने कई बार नालंदा की यात्रा की थी। वह यहां रहे भी थे। इस कारण इसे पाँचवी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक बौद्ध शिक्षा के केन्द्र के रूप में भी देखा जाता था, जहाँ संस्यासियों को अनुकूल शिक्षा और आध्यात्म का वातावरण प्रदान किया जाता था।

nalanda education motives

3. गुप्त राजवंश ने की थी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना

ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक इस विश्व-प्रसिद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के पराक्रमी शासक सम्राट कुमारगुप्त ने की थी। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग सहित कई यात्रियों और लेखकों ने सम्राट कुमारगुप्त के इस विश्वविद्यालय के संस्थापक होने का हवाला दिया है। नालंदा में मिली मुद्राओं से भी इस बात की जानकारी मिलती है।

currencies at the time of Gupta Dynasty

4. विशालकाय पुस्तकालय जो 6 महीने तक जलता रहा

नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय ‘धर्म गूंज’, जिसका अर्थ है ‘सत्य का पर्वत’, संभवतः दुनिया का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। यह दुनिया भर में भारतीय ज्ञान का अब तक का सबसे प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध केन्द्र था। ऐसा कहा जाता है कि पुस्तकालय में हजारों की संख्या में पुस्तकें और संस्मरण उपलब्ध थे। इस विशालकाय पुस्तकालय के आकार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें लगी आग को बुझाने में छह महीने से अधिक का समय लग गया। इसे इस्लामिक आक्रमणकारियों ने आग के हवाले कर दिया था। नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में तीन मुख्य भवन थे, जिसमें नौ मंजिलें थी। तीन पुस्तकालय भवनों के नाम थे रत्नरंजक’, ‘रत्नोदधि’, और ‘रत्नसागर’।

library nalanda university



5. पाठ्यक्रम

तिब्बती परंपरा के अनुसार, विश्वविद्यालय में चार दृष्टिकोण निहित संग्रहों को आयोजित किया गया, जिसे नालंदा में पढ़ाया जाता था। जिसमें शामिल है :

  • सर्वास्तिवदा  सौत्रांतिका
  • सर्वास्तिवदा वैभिका
  • महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का विस्तृत रूप से अध्ययन

Curriculum

6. प्रशासन

ईजिंग के लेखन के अनुसार, यहां होने वाले चर्चाओं में सबकी भागीदारी अनिवार्य थी। प्रशासनिक मामलों पर चर्चा हो या फिर शैक्षणिक मामलों पर, वहां रहने वाले संन्यासियों, शिक्षकों और छात्रों की भागीदारी जरूरी थी। सभा में मौजूद सभी लोगों के फैसले पर संयुक्त रूप से आम सहमति की आवश्यकता होती थी। विश्वविद्यालय की प्रशासनिक प्रणाली, एक तरह से लोकतांत्रिक थी।

Administration

7. बौद्ध धर्म पर प्रभाव

नालंदा विश्वविद्यालय के अधिकतर छात्र तिब्बतीय बौद्ध संस्कृतियों वज्रयान और महायान से संबद्ध थे। इनमें शिक्षकों की संख्या भी अधिक थी। बौद्ध सूक्ष्मवाद के प्राथमिक सिद्धांतकारों और भारतीय दार्शनिक तर्कशास्त्र के बौद्ध संस्थापकों में से एक महान विद्वान धर्मकीर्ति जैसे आचार्य यहाँ विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया करते थे।

Influence on Buddhism

8. खंडहर

नालंदा विश्वविद्यालय की कई विध्वंस हो चुकी प्राचीन सरचनाएं अब भी मौजूद हैं। यहाँ खुदाई के दौरान मिले अवशेष 150,000 वर्ग फुट मीटर के एक क्षेत्र में विस्तृत रूप से मिले है। ऐसा माना जाता है कि अभी भी नालंदा विश्वविद्यालय का 90 फीसदी क्षेत्र ऐसा है, जिसकी खुदाई नहीं हुई है।

Nalanda University Ruins


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