इस झील में पड़ा है अकूत ‘खजाना’, निकालने की हिम्मत कोई नहीं करता

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Updated on 3 Feb, 2016 at 12:01 am

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हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किलोमीटर दूर ‘रोहांडा’ नामक स्थान में सुदूर घने पहाड़ों के बीच स्थित “कमरूनाग” झील अपनी दिव्यता और ‘अकूत’ खजाने के लिए काफी चर्चित है। माना जाता है की यहां पौराणिक काल से लगातार सोने-चांदी और अन्य जवाहरातों सहित काफी सारा धन डाला जाता रहा है। यह झील के गर्त में इकठ्ठा होकर ‘खजाने’ का रूप ले चुका है।

बाबा ‘कमरूनाग’ करते हैं झील की रक्षा

प्राचीन मान्यता है कि इस झील में सोना और अन्य रत्न डालने से भक्तों की सारी मन्नतें पूरी होती हैं। माना जाता है की ‘खजाना’ सीधा पाताल की ओर जाता है, जहां देवताओं का खजाना है। इसकी रक्षा किसी जीवित व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि पहाड़ों में बारिश के देवता के रूप में पूजे जाने वाले बाबा ‘कमरूनाग’ और उनके सेवकों द्वारा की जाती है।

मान्यता है कि जिसने भी इसे निकालने की कोशिश की, उसका समूल नाश हो गया। यही कारण है कि इसे निकालने का दुःसाहस कोई नहीं करता।


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झील और कमरूनाग का महाभारत काल से है संबंध

महाभारत में ‘कमरूनाग’ को बभ्रुवाहन कहा गया है। अतुलित बलशाली और अजेय बभ्रुवाहन अर्जुन के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने युद्ध में अपने पिता का साथ नहीं दिया। उनका प्रण था कि वे युद्ध में हार रही सेना का ही साथ देंगे और इसलिए वे युद्ध में किसी के पक्ष में जाने का फैसला युद्ध के बीच में करेंगे।

भगवान् कृष्ण ने बड़ी कुटिलता से उन्हें एक शर्त में हरा दिया और उनसे अपनी ‘गर्दन’ काट कर देने को राजी कर लिया, क्योंकि उनका युद्ध में भाग लेना पांडवों की हार का कारण बन सकता था। उनके कटे सर को महाबली भीम ने एक विशाल पत्थर में बांधकर पांडवों की तरफ घुमा दिया, जिससे पांडवों की सेना युद्ध में जीत हासिल कर सकी।



उनके ‘मस्तक’ के समीप इस झील का निर्माण महाबली भीम ने किया था।

पहाड़ों के प्रमुख देवता हैं ‘कमरूनाग’

दुर्गम वन और पहाड़ों के बीच स्थित इस झील के बगल में भगवान “कमरुनाग” का एक भव्य मंदिर है। पहाडी लोगों में बाबा ‘कमरूनाथ’ के प्रति अगाध श्रद्धा है। “कमरूनाथ” वर्षा के देवता माने जाते हैं।

हर साल जून के महीनें की 14 व 15 तारीख को यहां बाबा कमरूनाथ भक्तों को दर्शन देते हैं। पूरे आषाढ़ महीने में यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसके दौरान भक्त अपना कुछ रुपया-पैसा और अन्य कई आभूषण बाबा ‘कमरूनाथ’ के निमित्त झील को अर्पित करते हैं।

यह परम्परा सदियों से चली आ रही है, जिसके कारण झील के गर्त में ‘भारी’ रत्नसंपदा इकठ्ठा हो गई है।

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