रहस्यमय है कोणार्क का सूर्य मंदिर, भारतीय वास्तुकला का है अनोखा उदाहरण

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Updated on 1 Mar, 2016 at 1:34 pm

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कोणार्क का सूर्य मंदिर न केवल अपने रहस्यों के लिए जाना जाता है, बल्कि यह मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला का अनोखा उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था। इसे 1250 ई. में श्रद्धालुओं के लिए खोला गया था।

यह मंदिर अपने विशिष्ट आकार और शिल्पकला के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यह भारत के उत्कृष्ट स्मारक स्थलों में एक है।

हिन्दू शास्त्रों में उल्लेख है कि भगवान सूर्य के रथ में 12 जोड़ी पहिए हैं और रथ को 7 घोड़े मिलकर खींचने का काम करते हैं। यह मंदिर महान सूर्य रथ की प्रतिलिपि दिखाई पड़ता है।

यह मंदिर प्रेम में मग्न मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है। इसके अलावा यहां उकेरी गई शिल्पाकृतियों में देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र भी प्रमुख हैं।


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अब इस मंदिर में कोई भी देव प्रतिमा नहीं है। बताया जाता है कि यहां की सूर्य प्रतिमा को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सुरक्षित रखा गया है। हालांकि, कई लोगों का मानना है कि सूर्य देव की मूर्ति, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है, कोणार्क की प्रधान पूज्य मूर्ति है।

विकीपीडिया के मुताबिक, वर्ष 1568 तक ओडिशा मुस्लिम आक्रान्ताओं के नियंत्रण में आ गया था। समय-समय पर यहां हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के प्रयास होते रहे थे।

कोणार्क के प्रमुख सूर्य प्रतिमा को यहां से हटाकर वर्षों रेत में दबा कर रखा गया था।

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