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राह चलती लड़की को अपनी जागीर समझता था वो. सबकी तरह मैं भी चुप रही.

Published on 9 November, 2016 at 7:13 pm By

सुबह 6 बजे की पहली बस मिलती थी, मुझे कॉलेज जाने के लिए। दिसम्बर की ठण्ड थी और कोहरा आसमान से उतर कर मन में घर कर रहा था। मेरी कई दिनों से चिंता थी, माँ की बिगड़ती तबीयत की। दवाओं का असर नहीं हो रहा था और डॉक्टर साहब के हिसाब से अब ज़्यादा उम्मीद नहीं थी। इसी उधेड़बुन में कब बस आयी और मैं कब बस में चढ़ गयी, इसका पता नहीं चला। सुबह की खुली सड़क पर बस चलने लगी और मैं खो गयी खिड़की से बाहर पीछे छूट रहे घर, दुकान, मैदान देखने में। खुली खिड़कियों से आने वाली हवा मेरे बालों को सहला रही थी और मन में माँ की चिंता का असर कम हो रहा था। ऐसा लग रहा था की हवा दिलासा दे रही हो।


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तभी अचानक ऐसा लगा मानो हवा की जगह किसी इंसान की हथेली गर्दन से होकर बालों में हाथ फेरने लगी। मैं अपनी दुनिया से झटका खा कर बाहर आयी और गर्दन को एक तरफ झुकाते हुए पीछे मुड़ कर देखा तो एक नयी उमर का लड़का अपना हाथ पीछे खींचकर मुस्कुरा रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था की कैसे पेश आऊं। कुछ तो सबके सामने बोलने की झिझक और बाकी डर की वजह से कुछ बोल नहीं सकी। मैं चुपचाप बस में आगे बढ़ कर कंडक्टर के सामने खड़ी हो गयी। वह लगातार मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था और धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मेरे पीछे आ खड़ा हो गया। इस वक़्त मेरे मन में जल्दी कॉलेज आ जाए, बस यही चल रहा था। उसने एक बार फिर कोशिश की अपने शरीर को मुझसे छूने की, पर मैं और आगे आकर बस से उतरने वाली सीढ़ियों पर खड़ी हो गयी। कुछ मिनटों बाद ही मेरा कॉलेज आ गया और मैं उतर कर पूरी तेजी से कॉलेज के अंदर चलने लगी।

अगले दिन जब मैं बस पर चढ़ी तो सबसे पहली नज़र उसी लड़के पर पड़ी। उसे देख कर यह लग रहा था कि वह किसी शिकार की तलाश में है और जब यह बात दिल तक उतरी की मैं ही हूँ उसकी शिकार तो, दिल बैठने लगा। आज हवा, खाली सड़कें या पीछे जाती दुकानें वगैरह, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं तेज़ी से जाकर बस के आगे सीढ़ियों के पास चौकन्नी खड़ी हो गयी और कॉलेज आने का इंतज़ार करने लगी। कॉलेज आया और मैं झटपट उतर जाने की तैयारी कर ही रही थी कि तभी ऐसा लगा की किसी ने मेरा दुपट्टा पैरों से दबा रखा है। मैं झटके से उतरी तो दुपट्टा बस में रह गया। उस लड़के ने पैर से दुपट्टा दबा रखा था और मैं नीचे खड़ी शर्म और गुस्से से लाल हो गयी। बस कंडक्टर ने मुझे दुपट्टा थमाते हुए अजीब सी नज़र से देखा। बस चल दी। जाते-जाते बस की खिड़की से उस लड़के ने कहा, “अगर दुपट्टा गन्दा हो गया हो तो मुझे दे दीजिये, मैं कल साफ़ करके ले आऊंगा “।

अगले दिन कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं थी। अगली बस एक घंटे बाद थी, उससे जाने का मतलब देरी से पहुंचना है। मैंने सोचा की दो बातें प्रोफेसर की सुन लेना सही है, पर 6 बजे वाली बस तो नहीं पकड़ सकते। मैं घर से देर से निकली और बस पकड़कर कॉलेज पहुंची, पर पूरे रास्ते एक अनजान सा डर मुझे सताता रहा। जब मन दुःख और पीड़ा से भर जाता है तो वह गुस्से का रूप ले लेता है। पर यह गुस्सा किसी काम का नहीं था। मुझे उस लड़के का ख्याल आया कि वह आज मुझे नहीं पाकर कहीं कल एक घंटे बाद वाली बस न पकड़ ले और आज क्या कर रहा होगा वह? इस सवाल के मेरे जेहन में आते ही मेरे मन ने कहा कि आज वह मुझे नहीं तो किसी और लड़की के साथ भी यही कर रहा होगा।

यह ख्याल आते ही मेरा गुस्सा अपने चरम पर पहुंच गया और मन ने ठान ली कि उसे सबक सीखाना होगा। यह सिर्फ मेरी समस्या नहीं है, बल्कि किसी भी अनजान लड़की के लिए वह खतरा है। कुछ तो करना पड़ेगा इसके लिए? पर क्या?

कॉलेज में प्रोफेसर ने बोल दिया की या तो टाइम पर क्लास आओ या फिर घर पर बैठो। और मैं टाइम पर क्लास लगा नहीं सकती, जब तक कि उस लड़के को सबक न सिखा लूँ। मैंने कॉलेज जाना छोड़ दिया!

फिर कोई एक साल बाद, एक दिन मैं अपनी माँ की दवा लेने पास के एक बाजार में थी कि तभी मुझे वह बस वाला लड़का दिखाई दिया। वो मोबाइल रिचार्ज की दुकान पर खड़ा था और दुकानदार से बातें कर रहा था। एक बार तो उसे देखते ही मुझे डर लगा पर इस बार अनायास ही मैं उसको पीछे से खड़े होकर देखती रही। वह मुड़ा और एक तरफ चलने लगा। मैं भी उसके पीछे हो ली। वह एक घर के बाहर पहुंचकर रुक गया और घंटी बजाई। घर से एक लड़की निकली और दरवाज़ा खोल दिया। ये देखते ही मैं तेज़ी से उसके घर की तरफ बढ़ने लगी। किस्मत से आज भी मैंने वही दुपट्टा लिया हुआ था। लड़का अंदर चला गया था और दरवाज़ा बंद हो रहा था। मैं तेज़ी से पहुँच कर आवाज़ लगाई, ” सुनिए, एक मिनट।” वो रुक गयी और मेरी तरफ देखने लगी। मैं दरवाज़े पर पहुंचकर रुकी और तेज़ी से सांस लेते हुए बोला “ये दुपट्टा धोने को देने आयी हूँ, कल ले जाउंगी।” जैसे ही मैं मुड़ने लगी वो चहककर बोली ,”अरे क्या है ये? आप कौन हो? ये क्या मज़ाक है?”


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“जी मैंने आपको बताया तो , ये दुपट्टा धो के रख दीजियेगा। मैं कल आकर ले जाउंगी।”
“आप पागल हो गयी हैं क्या? मैं क्यों धोने लगी आपका दुपट्टा?”
“जब आपके घर वालों ने गन्दा किया है तो आप ही साफ़ करेंगी ना।”
“क्यों शोर हो रहा है? कौन आया है? ” शोर सुनकर अंदर से वो लड़का बाहर आया। मुझे देखते ही रुक गया वो जहाँ से उसकी नज़र मुझपर पड़ी। न तो आगे आ पा रहा था, न ही लौट सकता था।



“भाई, ये ज़बरदस्ती अपना दुपट्टा दे कर जा रही हैं कि हम साफ़ करके कल वापस करें” लड़के की बहन ने कहा।

अब मेरी बारी थी, “आपके भाई ने फैलाई है ये गन्दगी, जिससे मेरा दुपट्टा गन्दा हो गया है। और इन्होंने खुद ही कहा था की घर से साफ़ कर के दे देंगे। तो मैं खुद ही आ गयी यहाँ।”

ये सुनते ही वो लड़का मेरे पाँव पर गिर गया और माफ़ी माँगने लगा, लेकिन मेरी झिझक खुल चुकी थी।

“मेरे पैर पकड़ने से क्या होगा अब तो तुम्हें अपने मन की गन्दगी साफ़ करनी है, क्योंकि तुम्हारी इस गन्दी सोच और हरकत से समाज में आम लड़कियों के दुपट्टे रोज़ गंदे होते हैं”

राह चलती लड़की को अपनी जागीर समझता था वो लड़का. सबकी तरह मैं भी चुप रही.
लेकिन कब तक चुप रहती?

ये घटना आज से पांच साल पहले की है. लेकिन इस एक घटना ने मुझे इतना साहस दिया है की मैं एक छोटे से कस्बे से निकल कर, आज बंगलुरु में एक बड़ी कंपनी में कार्यरत हूँ! अच्छा कमा लेती हूँ, परिवार को भी संभाल रही हूँ लेकिन सबसे जरूरी बात यह है की मैं अपने साथ या किसी और के साथ ऊपर-लिखित घटनाओं की तरह कुछ होने पर चुप नहीं रहती! मुझे लगता है की ये सब घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं  क्योंकि समाज के ‘अच्छे लोग’ चुप रहते हैं! उनकी ये चुप्पी ही समाज के असभ्य लोगों को साहस देते हैं! क्या आप चुप रहेंगे?

– तृषा, बंगलुरु


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