550 साल से ‘ध्यान-मग्न’ है यह संत; गांव वाले करते हैं बारी-बारी से देखभाल

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Updated on 14 Mar, 2017 at 5:46 pm

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तिब्बत से करीब 2 किलोमीटर दूरी पर हिमाचल प्रदेश में लाहुल स्पिती के गीयू गांव (Geu village) में एक ध्यान-मग्न संत की ममी मिली है। हालांकि, विशेषज्ञ इसे ममी मानने से इन्कार कर रहे हैं, क्योंकि इसके बाल और नाख़ून आज भी बढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह ममी ध्यान-मग्न अवस्था में है। इस संबंध में इन्डियन एक्सप्रेस अखबार में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।

अब तक दुनिया में जितनी भी ममी पाई गई हैं, वे लेटी हुई अवस्था में हैं। यही वजह है कि इस ममी के योगयुक्त होने की बात कही जा रही है। आइए जानते हैं ध्यान-मग्न संत के राज।

1. ध्यानपूर्वक देखने पर पता चलता है कि यह एक ध्यानस्थ संत की ममी है। गांव वालों के अनुसार ये ममी पहले गांव में ही रखी हुई थी और एक स्तूप में स्थापित थी। तिब्बत के नजदीक होने के कारण यह बौद्ध भिक्षु की ममी लगती है।

2. 1974 में आए शक्तिशाली भूकम्प के बाद ये कहीं मलबों में दब गई। वर्ष 1995 में ITBP के जवानों को सडक निर्माण के दौरान ये ममी मिली। स्थानीय लोगों के मुताबिक़, उस समय इस ममी के सिर पर कुदाल लगने की वजह से खून भी निकला, जिसके निशान आज भी साफ देखे जा सकते हैं।

3. वर्ष 2009 तक ये ममी ITBP के कैम्पस में ही रखी रही। बाद में ग्रामीणों ने इसे धरोहर मानते हुए अपने गांव में स्थापित कर दिया। ममी को रखने के लिए शीशे का एक केबिन बनाया गया, जिसमें इसे रखा दिया गया। इस ध्यानस्थ ममी की देखभाल गांव में रहने वाले परिवार बारी-बारी से करते हैं।

4. जब इसे मलबों से बाहर निकाला गया था, तब विशेषज्ञों ने इसकी जांच की थी। बताया गया कि यह करीब 545 वर्ष पुरानी ममी है। लेकिन अचरज इस बात का है कि इतने साल तक बिना किसी लेप के और जमीन में दबी रहने के बावजूद ये कैसे इस अवस्था में यथावत है। गौरतलब है कि गीयू गांव साल के 7-8 महीने भारी बर्फबारी के कारण दुनिया से लगभग कटा रहता है।

5. गीयू गांव के बुजुर्गों का कहना है कि 15वीं शताब्दी में गांव में एक संत तपस्यारत रहते थे। उसी दौरान गांव में बिच्छुओं का बहुत प्रकोप हो गया। इस प्रकोप से गांव को बचाने के लिए इस संत ने ध्यान लगाने की सलाह दी।

6. संत की समाधि लगते ही गांव में बिना बारिश के इंद्रधनुष निकला और गांव बिछुओं से मुक्त हो गया।

7.एक अन्य मान्यता के मुताबिक़ ये जीवित ममी बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग की है, जो तिब्बत से भारत आए और यहीं इसी गांव में आकर ध्यान में बैठ गए और फिर उठे ही नहीं।


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ऐसा पहली बार नहीं है कि ऐसी जीवित ममियां पहली बार देखी गई हैं। भारत के कई हिस्सों में पुरातन कंदराओं में जीवित ममीनुमा ध्यानस्थ संतों के देखे जाने के प्रमाण हैं।

आंध्रप्रदेश की एक गुफा में एक अनाम संत से क्षण भर के लिए मिले लोगों का मानना है कि ध्यान से उठते ही जब संयोग से वे उनसे मिल गए तो उनका पहला प्रश्न वैदिक संस्कृत में था, “राजा परीक्षित कहां हैं? कलियुग जानकर वे पुनः ध्यान मुद्रा में चले गए।

यदि उन लोगों पर यकीन किया जाए, तो वह संत करीब पांच हजार वर्ष पुराने समय में भी जिंदा थे। हिमालय में ऐसे कई अदृश्य कंदराएं आज भी अस्तित्व में हैंं जहां तपस्वी तपस्या में लीन हैं।

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