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पाकिस्तान की जेलों में नरक की यातनाएं झेलकर भी जिन्दा रहे भारतीय जासूस की दर्दनाक दास्तान

Published on 26 May, 2016 at 12:44 pm By

“दुनिया की सारी दौलत भी मुझे वह सब झेलने के लिए प्रेरित नही कर सकती है, जो मोहनलाल भास्कर को लाहौर, कोट लखपत, मीयाँवाली और मुल्तान की जेलों में भोगना पड़ा। यह एक चमत्कार ही है कि इतना सब सहकर भी वह आज अपनी कहानी सुनाने के लिए जीवित है।”


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भारत के प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार खुशवन्त सिंह ने जब मोहनलाल भास्कर के द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ की प्रस्तावना लिखी होगी, तब ज़रूर उनके ज़ेहन में पाकिस्तान की जेलों में अकल्पनीय,  अमानवीय यातनाओं का खौफ गुजरा होगा, जो मोहनलाल भास्कर ने सही होंगी।

मोहनलाल भास्कर का जन्म 30 नवंबर 1942 को पंजाब के अबोहर तहसील में हुआ था। उनकी शादी को मात्र 8 महीने हुए थे, जब उनको पाकिस्तान की जेल में क़ैद कर लिया गया था। उस वक़्त उनकी पत्नी गर्भ से भी थीं। मोहनलाल को अपने बेटे का चेहरा देखने के लिए इतने वर्षो का इंतज़ार करना पड़ा क्या यह इंतज़ार किसी मानसिक यातना से कम है?

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शादी के समय का चित्र, जिसके एक वर्ष के भीतर ही पाकिस्तान में क़ैद हो गये

भास्कर ने जासूसी के आरोप में पाकिस्तान के विभिन्न जेलों में 6 वर्ष की क़ैद गुज़ारी थी। तमाम यातनाओं और प्रताड़नाओं से गुजरने के बावजूद पाकिस्तान की एजेन्सियां संबंधित खुफिया जानकारी उनसे नहीं निकलवा सकी थी।

कुछ यूं शुरू होता है मोहनलाल भास्कर का सफ़र।

“तेरे लहू से सींचा, है अनाज हमने खाया

यह जज़्बा-ए-शहादत, है उसी से हममें आया”

वाक़या है, 23 मार्च 1966 का। भगत सिंह की समाधि पर मेला लगा हुआ था। मोहनलाल भास्कर जब पूरे जोश के साथ इन पंक्तियों से भगत सिंह के देशभक्ति के ज़ज़्बे को संबोधित कर रहे थे, तब उनकी वाहवाही करने वाले सिर्फ़ आम लोग नही थे, बल्कि भारतीय ख़ुफ़िया विभाग के कुछ अधिकारी भी थे।

फिर यहां से शुरू होता है, एक आम इंसान से एक जासूस बनने का सफ़र। मोहनलाल भास्कर से मुहम्मद असलम बनने की कहानी और मौत की भीख मांगते एक भारतीय जासूस की  दर्दनाक दास्तान।

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पाकिस्तान जाने से पूर्व

दुश्मन मुल्क की सरहदें और एक भारतीय जासूस


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जासूस या गुप्तचर का जीवन, इतना आसान नही होता। वह भी तब, जब सीमा पार कर किसी दूसरे देश में हों। मोहनलाल भास्कर को पाकिस्तान में हो रहे परमाणु योजना से संबंधित अभियान के लिए चुना गया था। किसी को शक़ न हो, इसलिए भास्कर सुन्नत करा कर मुसलमान बन चुके थे। एक जासूस का जीवन इतना आत्मकेंद्रित होता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि भास्कर का ब्राह्मण से मुसलमान बनने की खबर उनकी पत्नी और परिवार को नही थी।

1967 का दौर था। पाकिस्तान आंतरिक मामलों की वजह से झुलस रहा था। जनरल से राष्ट्रपति बने अय्यूब ख़ान की तानाशाही कमजोर पड़ रही थी। ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो पाकिस्तानी अवाम में पसंदीदा चेहरा बन कर उभर रहे थे। 1965 के युद्ध के बाद भुट्टो ने ही पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम का ढांचा तैयार किया था। इसी परमाणु कार्यक्रम की जानकारी एकत्र करने के लिए भास्कर को पाकिस्तान में सक्रिय किया गया था।

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पाकिस्तान जाने से पूर्व

भास्कर ने जब पाकिस्तान जाना शुरू किया, तब वहां मार्शल लॉ लागू थे। हर तरफ मौत और हर कोई दुश्मन था। रात के अंधेरे में ख़ूंख़ार जानवरों के बीच सीमा पार करना, सेना के हाथों मारे जाने या पकड़े जाने का ख़ौफ़, रात बिताने के लिए वेश्याओं के कोठे और अपने देश भारत के लिए अहम जानकारी इकट्ठा करना जितना ही रोमांचक प्रतीत होते हैं, उससे कही ज़्यादा ख़तरनाक है। उससे भी अधिक इस बात का डर कि एक जासूस का राज़ न खुल जाए। फिर भी भास्कर बखूबी कार्य करते हुए पाकिस्तान के तमाम बड़े शहर लाहौर, सियालकोट, मुल्तान, लायलपुर, पेशावर, रावलपिंडी आदि शहरों में सक्रिय रहे। उन्होने पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम से संबंधित जानकारी भी एकत्र कर ली थी। पर शायद भास्कर की किस्मत में कुछ और ही लिखा था।

विश्वासघात और गिरफ्तारी

भास्कर पाकिस्तान के परमाणु बम संबंधित बहुत ही ख़ुफ़िया मिशन की सफलता के बहुत करीब थे। उन्होने इस्लामाबाद के एटॉमिक एनर्जी कमीशन के गुप्त दस्तावेज़ एक मुखबिर की मदद से सौदा करने वाले थे। लेकिन अपने ही साथी अमरीक सिंह के विश्वासघात की वजह से भास्कर को 16 सितंबर 1968 में लाहौर से गिरफ्तार कर लिया गया।

दरअसल, अमरीक सिंह भारत का जासूस था, जो कुछ पैसों की लालच में पाकिस्तानियों के हाथों बिक गया था। लेकिन कहते हैं ‘जैसी करनी वैसी भरनी’। ठीक यही हाल अमरीक सिंह के साथ हुआ। पाकिस्तान अपना मतलब साधने के बाद उसे भी जेल में सड़ने के लिए डाल चुका था। सच तो यह है कि गद्दारों का यही हश्र होता है। भास्कर अपनी पुस्तक में दोहरे जासूस अमरीक सिंह के बारे में लिखते हैंः 

“क्या वह यहा से ज़िंदा लौट सकेगा- लौट भी गया तो क्या जीने के काबिल रहेगा? क्या हिन्दुस्तानी सरकार उसे ज़िंदा छोड़ेगी? यही ख़यालात उसे हर घड़ी पागल किए दे रहे थे। शिकारी अपने ही जाल में फड़फड़ा रहा था।”

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विश्व विख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के द्वारा लिखा गया पत्र

 नर्क से भी बदतर पाकिस्तान की जेलें और अंतहीन यातनाओं का सफ़र।

“यातना आख़िर यातना है और इसकी कोई सीमा नही है। अगर हम किसी को यातना देने पर तुल जाएं तो उसके हज़ारों रास्ते हैं।”

किसी भी जासूस के जीवन में सबसे दर्दनाक पल उसके पकड़े जाने के बाद, पूछताछ के बहाने प्रताड़ित किए जाने का होता है। यातनाएं भी ऐसी, जिसकी कोई सीमा नही होती। गिरफ्तार किए जाने के बाद भास्कर को लौहार, कोट लखपत, मियांवाली और मुल्तान के विभिन्न जेलों में रखा गया। जहां उन्हे मानसिक और शारारिक रूप से प्रताड़ित किया गया।



 

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विदेश मंत्रालय द्वारा लिखे गये भास्कर के परिवार को पत्र जिसमें पुष्टि की गयी कि भास्कर पाकिस्तान की जेल में क़ैद हैं

भास्कर बताते हैं कि यातनायों की कोई सीमा नहीं होती थी। इन जेलों में भारतीय कैदियों को अलग छोटे तहख़ानेनुमा जेलों में नज़रबंद रखा जाता था। यातनाएं ऐसी कि या तो इनमें कैदी पागल हो जाते थे, या मर जाते थे। और जो बचे रहते, वे सिर्फ़ मौत की दुआ मांगते रहते थे। ज़िंदा बाहर निकलने या रिहा होने की कोई शर्त नहीं होती थी।

भास्कर को रोज मारना-पीटना तो आम बात थी। पाकिस्तानी पुलिस और पाकिस्तानी सेना के अधिकारी उसे तब तक पीटते, जब तक भास्कर बेहोश नही हो जाते। इतना ही नहीं, हैवानियत इस कदर होती थी कि बेहोश हो जाने के बाद अफ़ीम के हेवीडोज़ के इंजेक्शन दिए जाते थे। मोटे रस्से में लटका कर रखना, उनके संवेदनशील अंगों को सिगरेट और जलते कोयले से दागना, नाख़ूनों को नोच देने के अलावा बर्फ की सिल्ली पर नंगे बदल लिटाए रखना पाकिस्तानी जेलों में हिन्दुस्तानी कैदियों की दिनचर्या थी।

यही नही, भास्कर ने यातनाओं की हदें भी देखी हैं। उनके उन हिस्सों पर लाल मिर्च डाला जाता था, जिसके बारे में सोचने भर से रूह काँप जाती है।

भास्कर को पाकिस्तानियों ने यह प्रलोभन भी दिया की वह उनसे हाथ मिला लें और पाकिस्तान के लिए काम करें, लेकिन भास्कर कभी इस लालच में नही पड़े। हालांकि, उनकी यातनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ती गई, लेकिन भास्कर ने अपने राज़ कभी नही खोले। भास्कर सौभाग्यशाली थे, जो जीवित रिहा हुए लेकिन इतनी किस्मत वाले सभी नही होते।

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पाकिस्तान से लौटने पर पत्नी और बच्चे के साथ

 जेल में क़ैद एक भारतीय जासूस की नज़र से पाकिस्तान

इसमें कोई दो मत नही है कि मोहनलाल भास्कर को पाकिस्तान की एटॉमिक योजनाओं के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के लिए पाकिस्तान भेजा गया था लेकिन वो बहुत चतुराई के साथ इन ख़ुफ़िया राज़ों को दुनियाँ के सामने साझा नही किया। उन्होने कोट लखपत जेल में 14 वर्ष की बमाशक्कत क़ैद गुज़ारी। भास्कर उन काल कोठरियों से पाकिस्तान को बहुत करीब से देखा है।

भास्कर ने अयूब ख़ान की तानाशाही गिरते देखा। हालाँकि उनका अधिकांश समय जनरल याहया ख़ान जो पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह और तीसरे राष्ट्रपति थे, के कार्यकाल में गुज़रा। उन्होने पाकिस्तान की जेलों से पाकिस्तान को डाकुओं, वैश्याओं, दलालों और तस्करों को दीमक की तरह चाटते देखा। भास्कर ने ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को जेल में देखा और उन्हे पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनते भी देखा। भास्कर जब मियाँवाली जेल में थे तो बंगलादेश के जनक और बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान को भी लाया गया था। भास्कर बताते हैं कि तब उनसे और अन्य 7 भारतीय कैदियों से शेख मुजीबुर्रहमान के लिए कब्र खुदवाई गयी थी ।हालाँकि भुट्टो द्वारा उन्हे रिहा कर दिया गया था।

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पुस्तक लिखने के दौरान

भास्कर ने 1971 के भारत-पाकिस्तान की वो जंग की रातें भी देखी जब भारतीय विमान और फ़ौज़े सियालकोट के इलाक़े में साठ मील अंदर तक घुस आई थी। उन्होने मियाँवाली जेल से भारतीय बमवर्षक विमानो को देखा था जिन्होने जेल के ही पास रनवे को ध्वस्त कर दिया था ।दूसरे लफ़ज़ो में कहा जाए तो पाकिस्तानी कोठरियों में क़ैद हिंदुस्तानियों ने भारत की 1971 की फ़तह देखी थी।

भारत वापसी और वापस आने के बाद

48 , 65 और 71 की जंगों ने पाकिस्तान की कमर तोड़ कर रख दी थी। वह अब भारत के साथ बैर बढ़ा कर ख़तरा मोल नही लेना चाहता था। भुट्टो हालत की हक़ीकत से वाकिफ़ थे इसलिए 1972 में इंदिरा गाँधी के साथ ‘शिमला समझौता’ किया गया। इस समझौते में दोनों देशों के विभिन्न प्रश्नों पर बातचीत और समझौता किया गया।  इन में से एक प्रमुख विषय युद्ध बंदियों की अदला-बदली की भी शर्त थी। भास्कर भाग्यशाली थे उनको भारत द्वारा गिरफ्तार किए गये पाकिस्तानी जासूसों के साथ विनिमय किया गया।

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9 सितंबर 1974 को आख़िरकार वो दिन भी आ गया जब भास्कर को अन्य कैदियों के साथ रिहा किया गया। एक देशभक्त के लिए इससे ज़्यादा खुशी शायद और कुछ नही हो सकती कि वह लौट कर वापस अपने मुल्क लौट रहा था। इतने सालों से शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलने के बाद जर्जर हो चुके शरीर में न जाने कहाँ से इतनी स्फूर्ति आ गई कि अधिकारिक कार्यवाही करने के बाद वह भारत सीमा की तरफ दौड़ पड़े। वक़्त बहुत बदल चुका था। अपने पिता को देख कर भास्कर के आंसू बह पड़े। भास्कर कहते हैंः

“जब मैने अपने पिता की हालत देखी तो दिल में धक्का पहुचा। आंखें रो-रोकर धंस गईं थीं। चेहरे पर झुर्रियां ही झुर्रियां पड़ी हुई थीं। वह मुझे देखते ही लिपट कर रोने लगे और बोले ‘हमे छोड़कर कहां चले गये थे बेटा?’ मैने उन्हे बहुत मुस्किल से चुप कराया। वह मेरा एक एक अंग टटोलकर देख रहे थे कि कहीं मुझे अंगहीन तो नहीं कर दिया गया।”

भास्कर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वतन वापसी के बाद ज़िंदगी फिर से नए तरीके से शुरू करनी थी। वह अपनी ज़िंदगी से रूठे नहीं, बल्कि अपने जीवन को दोबारा नए सिरे से शुरू किया। इस कड़ी में समाज सेवा को मुख्य उद्देश्य बनाया और शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान देते हुए ‘मानव मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ की शुरुआत की।

 

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रिहाई पत्र

 

सन्न 2004 में फिल्म निर्माण क्षेत्र में कदम रखा और ‘ये है प्यार का मौसम’ नामक फिल्म का निर्माण किया। यहीं नहीं, हरिवंश राय बच्चन से प्रेरणा पाकर अपनी आत्मकथा ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ लिखी। जिसके लिए उन्हे 1989 में ‘श्रीकांत वर्मा’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मोहनलाल भास्कर ने 22 दिसंबर 2004 को दुनिया को अलविदा कहा।


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मैं ऐसे देशभक्त को दिल से सलाम करता हूं जो इतनी यातनाए सहने के बाद भी अपने दुखों का बोझ किसी और के सिर नहीं डालते और हमेशा देश से प्रेम कर मर मिटने के लिए प्रेरणा देते रहते हैं।

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