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पठानकोट हमले में शहीद भारत के 8 सपूत, जिनकी शहादत पर पूरा देश है शोकाकुल

Published on 5 January, 2016 at 12:32 pm By

इस शाम उगेगा सूरज ‘केसरिया’
देश का आज हर वीर ‘केसरिया’
रगो में दौड़ रहा लहु ‘केसरिया’
है शहीदी का बना रंग ‘केसरिया’

पठानकोट ऐयर बेस पर अब स्थिति सामान्य हो चुकी है। ज़िन्दगी फिर से रफ़्तार पकड़ रही है। हम आशा भी करते हैं की सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा। लेकिन एक चीज़ कभी सामान्य नही हो सकती। यह है उन 8 शहीदों की कमी, जो मुस्कुराते हुए इस देश के लिए अपनी जान दे गए। बिना सोचे, बिना परवाह किए कि उनके बाद उनके परिवार का क्या होगा।

आइए मिलते हैं मां भारती के उन वीर सपूतों से, जिन्होंने अपनी कुर्बानी देकर अपना और अपने देश का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिया है।

1.  राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के लेफ्टिनेंट कर्नल शहीद निरंजन कुमार

लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार केरल के मूल निवासी हैं। निरंजन उस वक़्त शहीद हो गए, जब एक मृत आतंकवादी के शरीर पर लगे बम को निष्क्रिय करने की कोशिश कर रहे थे।
शहीद निरंजन के पिता शिवराज के मुताबिकः
“निरंजन को हमेशा वर्दी से प्यार था और उस वर्दी को हमेशा पहनना चाहता था। हम उसके पार्थिव शरीर को पैतृक गांव ले जाएंगे, क्योंकि वह गांव में पहला व्यक्ति था, जो लेफ्टिनेंट कर्नल बना। सभी लोग उससे बहुत प्यार करते थे और अंतिम दर्शन करना चाहते हैं।”
शहीद निरंजन की बहन भाग्यलक्ष्मी उन्हें युद्ध वीर नाम से पुकरती है।

2. शहीद कैप्टन फ़तेह सिंह

कैप्टन फतेह सिंह अपनी क्षमता पहले भी राष्ट्रमंडल खेलों साबित कर चुके थे। कैप्टन फ़तेह सिंह एक राष्ट्रीय स्तर के शूटर थे। 15 डोगरा रेजिमेंट से सेवानिवृत्त होने के बाद डीएससी (रक्षा सुरक्षा कोर ), रक्षा मंत्रालय की विशेष इकाई में शामिल हो गए। शहीद फ़तेह सिंह 1995 के राष्ट्रमंडल खेलों में निशानेबाज़ी की स्पर्धाओं में स्वर्ण और रजत पदकों से पहले भी देश को गौरवान्वित कर चुके थे।


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शहीद फ़तेह सिंह के बाद उनके परिवार में उनकी पत्नी मधुबाला और दो बेटे गुरदीप सिंह दीपू और नितिन ठाकुर हैं। बड़ा बेटा गुरदीप सिंह दीपू भी अपने पिता के नक्शे कदम पर 15 डोगरा रेजिमेंट में तैनात है।

3. शहीद गार्ड कमांडो गुरसेवक सिंह

भले ही गुरसेवक सिंह के पास सिर्फ़ बीए की डिग्री थी, लेकिन वह शुरू से ही अपना मकसद जानता थे। इसलिए वह सेना में भर्ती हो गए। उनके अलावा उनके परिवार में पिता सुच्चा सिंह, भाई हरदीप सिंह और चाचा हवलदार सिंह पहले ही सेना मे शामिल थे।



शहीद गुरसेवक सिंह के पिता कहते हैं कि उनको अपने बेटे पर गर्व है और वह अपने पोते को भी सेना में आने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। शहीद गुरसेवक की  शादी हाल ही में 18 नवंबर को हुई थी। उनकी पत्नी अपने हाथों की मेहन्दी दिखाते हुए कहती हैं कि-

“मेने उन्हे आख़िरी बार शुक्रवार को फोन किया था लेकिन उन्होने मेरा फोन काट दिया और जवाब में एक मैसेज भेजा की फोन करूँगा. पर अगर फोन नही आया, तो सो जाना “

4. शहीद हवलदार कुलवंत सिंह

मात्र 19 साल की उम्र मे सेना से जुड़ने वाले शहीद कुलवंत सिंह उन 6 वीर शहीदों में से एक हैं, जिन्होने भारत मां के चरणों में अपनी जान न्योछावर कर दिए। वह देश के अन्य युवाओं के लिए एक अतुलनीय उदाहरण हैं।

5. शहीद हवलदार जगदीश चंद्र

शहीद जगदीश चंद्र वैसे तो रसोई घर मे काम करते थे, लेकिन जब आतंकवादियों के समूह को सेना के रसोई घर की तरफ आते देखा, तो अकेले ही खाली हाथ उनसे भिड़ गये। जहां लड़ते-लड़ते उन्होंने अपने प्राण गंवा दिए। वह आतंकवादियों को यह सबक दे गये की एक सच्चे भारत के सपूत से लड़ने का अंज़ाम क्या होता है।

6. शहीद हवलदार संजीवन सिंह राणा

शहीद संजीवन सिंह राणा आतंकी हमले के पहले दिन शहीद हुए। लेकिन वह कोई साधारण योद्धा नहीं थे। अपने सीने पर 5 गोलियां झेलने के बाद भी यह भारत का वीर सपूत आतंकवादियों का डट कर मुकाबला करता रहा। अपनी हर सांस को देश के नाम करने वाले इस सपूत को पूरा देश नमन करता है।

7. शहीद हवलदार मोहित चंद्र

हवलदार मोहित चंद्र के बारे में अभी विस्तृत जानकारी आनी बाकी है। लेकिन यह में निश्चित तौर पर कह सकता हूं की भारत माता के लिए शाहीद होने वाले 6 सपूतों से उनकी बहादुरी बिल्कुल भी कम नही होगी।

8. शहीद भारतीय वायु सेना के कमांडो करतार सिंह

करतार सिंह के बारे में अभी अधिक जानकारी नही प्राप्त किया जा सका है।


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हम सब भारतवासी इन वीर सपूतों के सदैव अभारी रहेंगे।

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