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ये हैं 21वीं सदी के पृथ्वीराज, आंखों पर पट्टी बांधकर चलाते हैं शब्दबेधी बाण

Published on 14 May, 2018 at 3:55 pm By

पौराणिक कथाओं में धनुर्विद्या के कई हैरतंगेज किस्से हैं। कहा जाता है कि त्रेता युग में राजा दशरथ और द्वापर युग में अर्जुन शब्दबेधी बाण चला सकते थे।


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कलियुग में पृथ्वीराज चौहान को धनुर्विद्या की इस कला में महारत हासिल थी।

 

 

फिलहाल हम जिनकी बात करने जा रहे हैं, उनका दावा है कि वह भी शब्दबेधी बाण चला सकते हैं। ये हैं 96 वर्षीय कोदूराम। वह रायपुर से महज 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम भिंभौरी में रहते हैं।



वर्षों से कोदूराम रामायण और रामकथा सुनाने के लिए गांव के लोगों को आमंत्रित करते आ रहे हैं। कुछ सालों पहले एक कथावाचक की सलाह पर उन्होंने धनुर्विद्या सीख ली। रामकथा के नाटक के साथ-साथ तीर चलाने की कला का प्रदर्शन भी श्रोताओं को काफी पसंद आने लगा। इसके बाद धीरे धीरे आंखों पर पट्टी बांधकर वो तीर से निशाना साधने लगे। कई वर्षों की कड़ी तपस्या और लगन के बाद आखिरकार कोदूराम ने आंखों पर पट्टी बांधकर बाण चलाने की कला में महारथ हासिल कर ली। अब लोग उन्हें वाण देवता के नाम से जानते हैं। उनकी  हैरतंगेज तीरंदाजी देख हर कोई स्तब्ध रह जाता है।


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उनकी उस प्रतिभा के लिए उन्हें साल 2004 में छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के दौरान सम्मानित भी किया जा चुका है।

 

 

इस कला को सीखने के लिए उन्होंने किसी गुरु का सहारा नहीं लिया, बल्कि खुद ही इसे सीखा। निशाने को भेदने के लिए कोदूराम वर्मा लकड़ियों को आकार देकर तीर तैयार करते हैं। तीर तैयार करने के लिए वह बहेलिया पद्धति का इस्तेमाल करते हैं।


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कोदूराम जिस अंदाज में तीरंदाजी करते है, वो अदभुत है। एक लकड़ी को जमीन पर गाड़ दिया जाता है। इसके बाद दो लकड़ियों को आपस में ठोक-ठोककर आवाज पैदा की जाती है। इस आवाज को सुनकर कोदूराम आंखों पर पट्टी बांधे जमीन पर गड़ी पतली सी लकड़ी पर अचूक निशाना लगाते हैं। इस उम्र में उन्हें इस तरह अचूक निशाना लगाते देख हर कोई दंग रह जाता है।

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