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मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति ममता बनर्जी की मजबूरी है या सोची-समझी रणनीति?

Published on 13 October, 2016 at 5:32 pm By

पश्चिम बंगाल इन दिनों दुर्गा पूजा को लेकर चर्चा में है। पिछले दो दिनों में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दुर्गा पूजा को लेकर दो फैसले दिए हैं। पहले फैसले में जहां वीरभूम के कांगलापहाड़ी गांव में रहने वाले हिन्दू समुदाय के लोगों को दुर्गा पूजा की अनुमति दी गई है, वहीं एक अन्य फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि कोलकाता में दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन विजयादशमी के दिन ही किया जाए।

वीरभूम का कांगलापहाड़ी पिछले साल चर्चा में आया था। इस गांव में करीब 300 हिन्दू परिवार रहते हैं। इसी गांव में रहने वाले 25 मुस्लिम परिवारों की आपत्ति की वजह से गांव के लोग पिछले चार साल से दुर्गा पूजा का आयोजन नहीं कर पा रहे थे।


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वहीं, दूसरी तरफ ममता बनर्जी की सरकार ने मोहर्रम को देखते हुए कानून-व्यवस्था का हवाला देकर पूजा आयोजकों को यह फरमान जारी किया था कि दुर्गा विसर्जन विजयादशमी या इसके अगले दिन नहीं, बल्कि दो दिन बाद किया जाए। हाईकोर्ट ने इसे सीधे तौर पर ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ करार दिया और राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने फैसला सुनाते हुए साफ शब्दों में कहा कि इससे जाहिर होता है कि राज्य सरकार अल्पसंख्यकों को केवल खुश करना चाहती है।

यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी की सरकार को कलकत्ता हाईकोर्ट से झटका लगा है।

वर्ष 2011 में सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मस्जिदों के ईमाम और मोअज्जिन को क्रमशः 2500 रुपए व 3500 रुपए प्रतिमाह भत्ता देने की घोषणा की थी। हालांकि, सरकार के इस फैसले को कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट के फैसले से नाखुश ममता बनर्जी ने एक दूसरा रास्ता निकाला। अब ईमामों और मुअज्जिनों का भत्ता वक्फ बोर्ड के माध्यम से दिया जा रहा है।

दक्षिण 24 परगना में ममता राज्य सरकार ने मुसलमानों के लिए मेडिकल कॉलेज खोलने की बात कही तो राज्य के बुद्धिजीवियों ने ही इस पर सवाल उठाया। कानून के जानकारों ने राज्य सरकार को कहा कि यह देश धर्मनिरपेक्ष है। इस देश में किसी विशेष सम्प्रदाय के लिए किसी अस्पताल या शिक्षण संस्थान के स्थापना की अनुमति संविधान नहीं देता।



राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी की सरकार सत्ता में आने के बाद मुस्लिम तुष्टीकरण का कोई मौका चूकना नहीं चाहती। यहां तक कि अगर मौका नहीं भी मिले, तो सरकार मौके तलाश लेती है।

अब सवाल उठता है कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार आखिर मुसलमानों को लुभाने की पुरजोर कोशिश क्यों कर रही है ?

इस प्रश्न का जवाब इन आंकड़ों में मिल सकता है।

पश्चिम बंगाल की 9.5 करोड़ की आबादी में 2.5 करोड़ मुसलमान हैं। अर्थात राज्य में 27 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब 140 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है।

अब एक नजर इस पर कि ममता बनर्जी ने मुसलमानों को क्या दिया है और मुसलमानों ने ममता को क्या वापस किया है।

पिछले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित 211 विधायकों में 32 मुसलमान हैं। वर्ष 2011 में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य सरकार ने मुस्लिमों के विकास के लिए आवंटित होने वाले बजट में चार गुना बढ़ोत्तरी की है। चालू वित्त वर्ष में मुसलमानों पर 2400 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं।


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मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति जहां ममता बनर्जी की मजबूरी है, वहीं तृणमूल कांग्रेस सत्ता में रहने के लिए इस मामले पर सोची-समझी रणनीति के तहत अागे बढ़ रही है।

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