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शहीद दिवस की रैली के बहाने ममता का शक्ति प्रदर्शन

Published on 21 July, 2017 at 4:25 pm By

प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस ने धर्मतल्ला में बड़ी जनसभा आयोजित की गई। तृणमूल कांग्रेस 21 जुलाई 1993 को राइटर्स घेराव के दौरान पुलिस फायरिंग में मरे 13 कार्यकर्ताओं की याद में प्रतिवर्ष शहीद दिवस मनाती रही है। पश्चिम बंगाल सरकार और तृणमूल कांग्रेस शहीद दिवस के आयोजन को गंभीरता से लेती रही है। हालांकि, इस साल हालात बदले-बदले हैं।

ममता बनर्जी अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान लगातार हो रहे दंगों और मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों की वजह से बैकफुट पर हैं।


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कोलकाता की हृदयस्थली कहे जाने वाले धर्मतल्ला इलाके में हुई इस रैली को ममता का शक्ति प्रदर्शन कहना चाहिए। रैली के एक दिन पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने मंसूबे साफ कर दिए थे।

सचिवालय में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहाः

“इसी दिन बंगाल के 13 युवा शहीद हुए थे व 1000 से अधिक घायल हुए थे। प्रत्येक वर्ष इस दिन शहीद दिवस का पालन किया जाता है। यह शपथ लेने का दिन है। लोकतंत्र की रक्षा का दिन है। नयी पीढ़ी, देश और बांग्ला को नया पथ दिखाने का दिन है।”

रैली में ममता बनर्जी केन्द्र पर बरसीं। उन्होंने कहाः



“देश में इस समय इमरजेंसी से भी बुरा माहौल है। नागरिक के अधिकार छीने जा रहा हैं। असली हिंदू भी नकली हिंदू के कारण परेशानी झेल रहे हैं। टीएमसी इन ताकतों के खिलाफ लड़ रही है, बीजेपी एक भ्रष्ट पार्टी है। ईडी और सीबीआई का उपयोग यूपी या गुजरात सरकार के खिलाफ नहीं किया जाता है।”

घोटाले और साम्प्रदायिक दंगों से पाकसाफ निकलने की चुनौती

ममता बनर्जी की सरकार के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान शारदा चिटफंड घोटाले से खुद को अलग साबित करना होगा। वहीं, पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता नारदा घूस कांड में भी आकंठ डूबे दिखते हैं। केन्द्र लगातार दबिश दे रहे हैं और इससे ममता की मुश्किलें बढ़ती ही गई हैं।

रही-सही कसर लगातार हो रहे सांप्रदायिक दंगों ने पूरी की है।


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मालदा से लेकर मुर्शिदाबाद तक और नैहाटी से लेकर नक्सलबाड़ी तक, एक के बाद एक कई साम्प्रदायिक दंगों की वजह से तृणमूल कांग्रेस की सरकार बदनाम हुई है। कई मामलों में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की संलिप्तता सामने आई है। सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के गंभीर आरोप हैं। मौलाना बरकती जैसे साम्प्रदायिक शक्तियों और दंगाइयों को प्रश्रय देने के आरोप भी लगे हैं। कभी कोलकाता को लंदन बनाने का दावा करने वाली ममता बनर्जी अधिकतर समय इन तमाम आरोपों से निपटने में जाया होता है। जाहिर है, विकास की चर्चा नहीं हो रही है।

बंगाल की राजनीति में नए युग की शुरुआत

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत देखने को मिली है। माहौल बदला-बदला है। इस राज्य में रामनवमी मनाने की परंपरा नहीं रही है। कुछ मठों, मंदिरों और कोलकाता के अर्थव्यवस्था की धूरी माने जाने वाले मारवाड़ी समुदाय को छोड़कर रामनवमी के संबंध में लोग कम ही जानते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां रामनवमी मनाने की परंपरा ने जोर पकड़ा है।

इस साल कोलकाता के अलावा दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर रामनवमी का आयोजन किया गया। ग्राम बांग्ला का इलाका भगवा पताकों से पटा पड़ा है। राज्य की राजनीति में यह बड़े बदलाव का संकेत है।

हिन्दूवादी राजनीति करने वाले संगठन खुलकर अपनी महात्वाकांक्षा का इजहार कर रहे हैं।


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ममता बनर्जी के सामने तमाम चुनौतियां हैं। इस लिहाज से शहीद दिवस की रैली सिर्फ रैली भर नहीं है। यह उनके राजनीतिक जीवन-मरण का प्रश्न है। यही वजह है कि यह रैली कम, शक्ति प्रदर्शन अधिक है।

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