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मकर संक्रांति के दिन ही भीष्म पितामह ने त्यागे थे अपने प्राण, इसके पीछे है एक विशेष कारण

Published on 14 January, 2017 at 5:55 pm By

महाभारत के अजेय योद्धा भीष्म पितामह के बिना महाभारत की कल्पना करना निरर्थक है। भीष्म पितामह का आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत, महाभारत में हुई कई घटनाओं का ऐसा कारक बना, जो अंत में अन्य किरदारों को रणभूमि कुरुक्षेत्र तक ले आया।

भीष्म ने अपने पिता भरतवंशी राजा शांतनु के खातिर सांसारिक जीवन के सभी सुखों और सिंहासन का बलिदान कर दिया। उनके पिता शांतनु एक लड़की से विवाह करना चाहते थे लेकिन उस लड़की के पिता ने शर्त रखी कि ‘यदि मेरी कन्या से उत्पन्न संतान ही आपके राज्य की उत्तराधिकारी हो तो मैं इसका विवाह आपके साथ करने को तैयार हूं।’


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यह सुनकर राजा शांतनु ने इंकार कर दिया, क्योंकि वह पहले ही भीष्म को युवराज बना चुके थे। इस घटना के बाद राजा शांतनु चुप से रहने लगे। जब भीष्म को इस पूरी घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने सबके सामने अखण्ड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली।

अपने बेटे के इस भीषण प्रतिज्ञा से प्रभावित होकर राजा शांतनु ने भीष्म को ‘इच्छामृत्यु’ का वरदान दिया।

bhishma

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति मोक्षदायी पर्व है। ऐसा कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र की लड़ाई में अर्जुन के बाणों से घायल होकर पितामह भीष्म शैया पर पड़े थे और वह अपने प्राण त्यागना चाहते थे लेकिन उस समय सूर्य दक्षिणायण था और मान्यता के अनुसार सूर्य के दक्षिणायण होने की स्थिति में मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि पुनर्जन्म होता है। इसलिए भीष्म ने अपने तप के बल पर सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण नहीं त्यागे। जैसे ही सूर्य उत्तरायण में प्रवेश किया, उन्होंने अपनी इच्छा मृत्यु प्राप्त की।

भारतीय ज्योतिष के अनुसार, मकर संक्रांति पर्व पर सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण में प्रवेश करता है।

भगवान कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय में कहा है कि जिस किसी की उत्तरायण के दौरान मृत्यु होती है वह मोक्ष प्राप्त करता है। लेकिन जिनकी मृत्यु दक्षिणायण में होती है, वह जीवन चक्र से बंधा रहता है।



अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम् |

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना: || 24||

धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम् |


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तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || 25||


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अर्थात- “अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छ: महीने, इनमें शरीर का त्याग करने वाले ब्रह्म के उपासक जन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। धूम, रात, कृष्णपक्ष और दक्षिणायण के छ: महीने, इनमें शरीर छोड़ने वाले चंद्रमा की ज्योति तक पहुंच के वापस आते हैं, अर्थात जन्म-मरण के चक्र को प्राप्त होते हैं।”

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