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राजपुताना शौर्य और बहादुरी के प्रतीक महाराणा प्रताप से जुड़े 15 रोचक पहलू

Updated on 19 January, 2017 at 12:53 am By

9 मई 1540 को कुम्भलगढ़ किला, राजस्थान में जन्में महाराणा प्रताप राजपुताना वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी जन्म-भूमि, मेवाड़ राजपुताना को उनके नियंत्रण से मुक्त करने में बिता दी।

महाराणा प्रताप अपनी सेना का प्रतिनिधित्व करते थे और उनके लिए भगवान से कम नहींं थे। मुग़ल सम्राट अकबर के खिलाफ हल्दीघाटी की लड़ाई में हारने के बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया और अंत तक उसका डटकर सामना किया।


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महाराणा प्रताप एक ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है, लेकिन इस बहादुर योद्धा के संबंध में कुछ ऐसी बातें हैं, जो बहुत लोगों ने नहीं सुनी होगी।

1. बचपन से ही वह बहादुर और निडर थे।

इक्का-दुक्का क्षेत्रों को छोड़ जब मुग़लों ने उत्तर भारत के अधिकतम जिलों को जीत लिया था, तब महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।

एक बालक होने के बावजूद, मेवाड़ के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और धनुर्विद्या में कठिन प्रशिक्षण लिया। राजकुमारों में सबसे प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण, पूरा राजपुताना राजवंश उनसे बहुत उम्मीद रखता था और वह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।

2. वह वैध उत्तराधिकारी साबित हुए।

वह राजगद्दी के लिए उदय सिंह के पसंदीदा पुत्र नहीं थे। यही वजह थी कि प्रताप नहीं, बल्कि उनके छोटे भाई जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी चुना गया।
भले ही मरते हुए राजा की इच्छा थी कि जगमाल राजा बनें, लेकिन मेवाड़ के वरिष्ठ दरबारियों ने प्रताप को वैध उत्तराधिकारी करार दिया और उन्हें राजा घोषित कर दिया।

3. उनकी 11 पत्नियां थी।

महाराणा प्रताप की 11 पत्नियां थीं। अजबदे पंवार को महारानी का दर्जा प्राप्त था। उनके 17 बेटे और 5 बेटियां थीं।

4. लंबे-चौड़े निडर योद्धा।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि महाराणा प्रताप 7 फुट, 5 इंच लंबे थे और युद्ध में कवच पहनते थे जो करीब 110 किलोग्राम का था।


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उदयपुर में शहर के ‘रॉयल गैलरी’ संग्रहालय में संरक्षित 2 भारी तलवार और एक भारी भाला है, जो महाराणा प्रताप इस्तेमाल करते थे।

5. उनका युद्ध कौशल सराहनीय था।

महाराणा प्रताप की बहादुरी के किस्से अब भी राजस्थान में सुनाए जाने की परम्परा है।

कहा जाता है कि एक बार युद्ध के बीच एक मुग़ल सैनिक ने उन पर पीछे से वार करना चाहा, लेकिन महाराणा ने अपनी आंखों के किनारे से ही उसकी चाल को भांप लिया। अपनी तलवार के एक शक्तिशाली झटके से दोनों सैनिकों और घोड़े को मार गिराया। यह कहानी उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक है।

6. छल-कपट से नहीं, वे दुश्मनों पर सामने से हमला करते थे।

राजा मान सिंह जो एक राजपूत राजा लेकिन मुग़ल सेनापति थे, शिकार पर बाहर गए थे, जहां मेवाड़ सैनिकों का आसान निशाना हो सकते थे। महाराणा प्रताप इस लालच में नहीं आए और कहा कि वह छुपकर वार नहीं करते। लड़ाई के मैदान पर अपने विरोधियों का सामना करना अधिक पसंद करते हैं।

7. वें महिलाओं की गरिमा को बनाए रखते थे।

एक अवसर पर, अमर सिंह लड़ाई में जीत के बाद बंधकों के रूप में कुछ मुस्लिम महिलाओं को ले आए। यह महाराणा प्रताप को गंवारा नहीं था। उन्होंने महिलाओं को मुक्त कर दिया, गरिमा के साथ उन्हें घर भेज दिया गया।

8. महाराणा प्रताप छापामार युद्ध रणनीति में थे माहिर।



महाराणा प्रताप ने बस कुछ सैनिकों के साथ, उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली मुग़ल सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने छापामार रणनीति का इस्तेमाल किया और दुश्मन की सेना को आगे बढ़ने से रोकने में सफल साबित हुए। वह अपने जीवनकाल में मेवाड़ के बड़े प्रदेशों पर स्वतंत्रता के झंडे को सदैव लहराते रहे।

9. उन्होंने मातृभूमि को मुक्त कराने की प्रतिज्ञा ली थी।

चित्तौड़ का मजबूत किला मेवाड़ घराने की विरासत थी और मुग़ल सेना ने उसे अपने अधिकार में कर लिया था। प्रताप ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह जब तक चित्तौड़ को आजाद नहीं करा लेते, तब तक भूसे के बिस्तर पर सोएंगे और पत्तल के थाली में खाएंगे।

प्रताप ने मुग़लों का डटकर सामना किया और कई साल तक उनसे लड़ते रहे, लेकिन चित्तौड़ को वापस जीत नहीं सके। वह अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटे।

उनके आदर में आज भी कई राजपूत अपने थाली की नीचे एक पत्ता और अपने बिस्तर के नीचे भूसा रखते हैं।

10. अकबर की सर्वोच्चता को कभी स्वीकार नहीं की।

राणा प्रताप ने शांति के कई प्रस्तावों को मना कर दिया था। उन्होंने मुग़लों की या सम्राट अकबर की सर्वोच्चता को कभी न स्वीकार करने की कसम खाई थी।

स्वतंत्रता के खातिर उन्होंने आराम और सुख की ज़िंदगी को ठुकरा दिया। यही नहीं, अपनी पूरी ज़िंदगी मुगलों से लड़ने में बिता दी।

11. हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप ने अपने से बहुत बड़ी सेना के खिलाफ जंग छेड़ी।

18 जून, 1576 को महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूत सेना ने चित्तौड़ को वापस हथियाने का प्रयास किया और हल्दीघाटी में एक बड़ी लड़ाई लड़ी।

2 लाख सिपाहियों की मुग़ल सेना को मात्र 22,000 राजपूत योद्धाओं ने कड़ी टक्कर दी। संख्या में कम होने की वजह से वह युद्ध तो हार गए, लेकिन जिस वीरता के साथ महाराणा प्रताप और उनकी सेना ने जंग लड़ी, मुग़ल सेनापति राजा मान सिंह और आसफ खान भी उनकी तारीफ़ करते नहीं थके।

12. चेतक ने राणा को बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

राणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध में घायल हो गए थे, तब उनके घोड़े चेतक ने उनकी जान बचाई। राणा प्रताप को एक चौड़ी खाई पार कराने के लिए उसने अपनी ज़िंदगी की आखरी छलांग लगाई। चेतक किसी तरह अपने आगे के टांगों से नहर पार करने में सफल रहा, परंतु सिर्फ अपने मालिक को बचाने में कामयाब रहा।

उस घोड़े को नहर में गिरकर अपनी जान की आहुति देनी पड़ी, लेकिन वह तब तक नहीं गिरा, जब तक प्रताप ने सफलतापूर्वक और सुरक्षित उस नहर को पार नहीं कर लिया।

13. कभी हार न मानने वाले राणा प्रताप ने लड़ाई जारी रखी।

हल्दीघाटी का युद्ध, प्रताप के स्वतंत्र मेवाड़ के सपने को नहीं हिला सका। वह अपने परिवार के साथ जंगलों में रहे और भामाशाह जैसे भरोसेमंद सेनानियों के साथ फिर से एकजुट हुए और जिस राज्य को मुग़ल सेना ने हथिया लिया था, उसे वापस हासिल किया।

14. मुग़ल दरबार महाराणा प्रताप को पराजित करना चाहता था।

मुगल सेना के लिए, राणा प्रताप, एक कट्टर दुश्मन थे, लेकिन रणनीतिकार उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल के प्रशंसक थे। शेख रेहमुर खान, अकबर के दरबार में एक महान और सैन्य रणनीतिकार, ने सम्राट की खुली अदालत में टिप्पणी की थी, “अगर आप महाराणा प्रताप व जयमल मेरतिया पर जीत हासिल कर सकते है, तो कोई भी आपको पूरे हिंदुस्तान पर राज करने से नहीं रोक सकता।”

15. आखिरी सांस तक देखा था स्वतंत्र चित्तौड़ का सपना।


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मेवाड़ को छोड़कर, अकबर ने वैवाहिक गठबंधन या लड़ाई के माध्यम से, सभी राजपूत राज्यों पर जीत हासिल कर ली थी। सिर्फ मेवाड़ और उसके शासक महाराणा प्रताप, ने लगातार स्वतंत्रता की अपनी गौरवशाली परम्परा को जीवित रखने के लिए मुग़ल सेना से लड़ाई लड़ी। वह अंत तक स्वतंत्र चित्तौड़ का सपना देखते रहे थे। अपने सपने को फीका होते देख, भूसे की बनी अपने मृत्युशय्या में लेटे, राणा प्रताप ने अपने बेटे अमर सिंह को चित्तौड़ की मुक्ति की प्रतिज्ञा लेने की ज़िम्मेदारी सौंपी।

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