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आसमान से बातें करता था महाराणा प्रताप का घोड़ा ‘चेतक’, मुगल सेना के उड़ा दिए थे होश

Updated on 16 October, 2018 at 6:52 pm By

“रण बीच चौकड़ी भर-भर चेतक बन गया निराला था,
राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा को पाला था,
जो बाग हवा से ज़रा हिली लेकर सवार उड़ जाता था,
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था”

श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा लिखी गई ‘चेतक की वीरता’ नाम की यह सुन्दर कविता हम सभी ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ी होगी। महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण अरबी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। हल्दी घाटी-(1576) के प्रसिद्ध युद्ध में चेतक ने अपनी अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का जो परिचय दिया था, वो इतिहास में अमर है।

जब चेतक रणभूमि में बिजली बन कर कूद पड़ा

अकबर की सेना में लड़ाके ज्यादा थे, तोपें थी और हाथियों की अधिकता भी थी जबकि महाराणा प्रताप की सेना, अकबर की सेना की तुलना में कम थी। लेकिन महाराणा प्रताप का घोड़ा ‘चेतक’ दुश्मनों की सेना पर भारी था। महाराणा प्रताप अपने वीर घोड़े चेतक पर सवार होकर रणभूमि में आए थे, जो बिजली की तरह दौड़ता था और पल भर में एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाता था।

अकबर की सेना पर जब भारी पड़ा चेतक


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अकबर की विशाल सेना बलशाली हाथियों से सुसज्जित थी लेकिन महाराणा प्रताप का वीर घोड़ा चेतक उन सभी हाथियों पर अकेला भारी था। युद्ध के दौरान चेतक के सिर पर हाथी का मुखौटा बांधा गया था ताकि हाथियों को भरमाया जा सके।

माना जाता है कि चेतक पर सवार महाराणा प्रताप दुश्मनों के लिए काल बन गये थे। दोनो के प्रताप और साहस के आगे सेनापति मानसिंह की सेना असहाय सी लग रही थी। कहा जाता है कि दुश्मनो के हाथियों को भ्रमित करने के लिए चेतक के मुंह में सूंड़ लगा दिया गया था। 

युद्ध में एक ऐसा भी समय आया जब महाराणा प्रताप का मानसिंह से सामना हुआ। बस महाराणा प्रताप को चेतक के एक एड़ लगाने की ज़रूरत पड़ी और चेतक सीधा मानसिंह के हाथी के मस्तक पर चढ़ गया। चेतक के इस वार से मानसिंह हौदे में छिप गया लेकिन राणा के वार से महावत मारा गया। हालांकि हाथी से उतरते समय चेतक का एक पैर हाथी की सूंड में बंधी तलवार से कट गया। 

अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का दूसरा नाम ‘चेतक’



हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक की भूमिका सिर्फ़ एक योद्धा अश्व की नही थी, बल्कि वह महाराणा प्रताप का दोस्त और बेमिसाल सहयोगी था उसकी अतुलनीय स्वामिभक्ति कि वजह से ही उसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ अश्व का दर्ज़ा दिया गया स्वामी भक्ति ऐसी कि मुगल सेना भी उसकी वीरता के सामने नतमस्तक थी। 

चेतक अपने स्वामी महाराणा प्रताप की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए,   अपने एक पैर कटे होने के बावजूद महाराणा को सुरक्षित स्थान पर लाने के लिए, बिना रुके पांच किलोमीटर तक दौड़ा। यहां तक कि उसने रास्ते में पड़ने वाले 100 मीटर के बरसाती नाले को भी एक छलांग में पार कर लिया। जिसे मुगल की सेना पार ना कर सकी।

राणा को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बाद ही चेतक ने अपने प्राण छोड़े

प्रताप को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बाद ही चेतक ने अपने प्राण त्यागे युद्ध में अपने इतने प्रियजनों, मित्रों, सैनिकों और घोड़े चेतक को खोने के बाद महाराणा प्रताप ने प्रण किया था कि वो जब तक मेवाड़ वापस प्राप्त नहीं कर लेते घास की रोटी खाएंगे और ज़मीन पर सोएंगे।


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आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था। चेतक की स्वामिभक्ति पर बने कुछ लोकगीत मेवाड़ में आज भी गाये जाते हैं।

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