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महाभारत काल से है यह शिवलिंग, इसमें देख सकते हैं अपनी छवि

Published on 3 February, 2017 at 1:22 pm By

आदिकाल से भारत धार्मिक तथा सांस्कृतिक विविधताओं का देश रहा है। सनातन धर्म में इस सृष्टि के रचैयिता भगवान भोले शंकर का अनन्य स्थान है। इस देश में देवों के देव कहे जाने वाले महादेव के लाखों मंदिर मौजूद हैं, जिनमें उनके भक्त उनकी अराधना करते हैं।


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खास बात यह है कि भगवान भोले शंकर के ये मंदिर और इसमें मौजूद शिवलिंग अपनी खासियत लिए होते हैं। ये विविधताओं से भरपूर होते हैं। ऐसा ही एक मंदिर उत्तराखंड के मसूरी में स्थित है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग में आप अपनी छवि देख सकते हैं। यह मंदिर स्थित है मसूरी से 75 किलोमीटर उत्तर में लखमंडल गांव में।

इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है।

मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत काल में पांडवों ने लाक्षागृह से निकलने के लिए जिस गुफा का इस्तेमाल किया था, वह लखमंडल में खत्म होती थी। पांडव यहां कुछ दिन रुके थे और इस स्थान को लखमंडल का नाम दिया था। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था और शिवलिंग की स्थापना स्वयं युधिष्ठिर ने की थी।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुताबिक, मंदिर का निर्माण 12वीं और 13वीं शताब्दी के बीच नागर शैली में की गई थी। हालांकि, शिवलिंग की आयु के बारे में आधुनिक इतिहासकार एकमत नहीं हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां एक समय लाखों मंदिर थे। यही वजह है कि इस स्थान का नाम लखमंडल पड़ा।



 

फिलहाल लखमंडल में स्थित इस मंदिर प्रांगण में कई छोटे-बड़े शिवलिंग मौजूद दिखते हैं। यह खास शिवलिंग उन्हीं में से एक है। खास बात यह है कि यह शिवलिंग गर्भगृह में स्थापित नहीं है, इसके बावजूद इसकी पूजा मुख्य रूप से होती है।

यह ग्रेफाइट पत्थर से बना है और इतना चमकदार है कि इसमें आप अपनी छवि भी देख सकते हैं।

इसके अलावा मंदिर परिसर में और भी दिलचस्प चीजें हैं। यहां मंदिर प्रांगण में दो मूर्तियां स्थित हैं। इन मुर्तियों को दानव और मानव के नाम से जाना जाता है। इन्हें मंदिर परिसर के पहरेदार के रूप में देखा जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी का अभी निधन हुआ हो, तो उसे इस परिसर में इन मूर्तियों के सामने लाकर कुछ क्षण के लिए जीवित किया जा सकता है।

हालांकि इतिहास के इस महत्वपूर्ण मंदिर परिसर का ध्यान ढंग से नहीं रखा जाता है. ये बात बेहद दुखद है कि इन प्राचीन पुरातात्विक संरचनाओं पर मध्यकालीन इमारतों से कम ध्यान दिया जाता है.


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इस मंदिर और शिवलिंग का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है। इसके बावजूद यह उपेक्षित है।

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