मैहर माता के मंदिर में आज भी आते हैं आल्हा, करते हैं देवी की पूजा !

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Updated on 17 Feb, 2016 at 6:51 pm

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मध्यप्रदेश के सतना जिले में मैहर की माता शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है। भक्तों का ऐसा मानना है की शाम की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद हो जाती है तब माता के प्रिय भक्त आल्हा मंदिर में आते हैं पूजा अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि उस वक्त बंद मंदिर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती रहती है।

पिरामिडाकार त्रिकूट पर्वत में स्थापित इस मंदिर का निर्माण 522 ईसा पूर्व किया गया था। ऐसी मान्यता है कि 522 ईसा पूर्व नृपल देव ने चतुर्दशी के दिन यहां सामवेदी की स्थापना की थी। उसके बाद से ही यहां पूजा-अर्चना शुरू की गई थी।

मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे एक शिलालेख है, जो अपने-आप में कई पहेलियां समेटे हुए है। इस शिलालेख को आज तक नहीं पढ़ा जा सका है। इस मंदिर मे जीव बलि प्रतिबंधित है। वर्ष 1922 में महाराजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने ऐसा लागू करवाया था।

विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर के बारे मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी। मैहर पर्वत का नाम प्राचीन धर्मग्रंथ ‘महेन्द्र’ में मिलता है। इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है।


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मैहर स्थित जन सूचना केंद्र के प्रभारी पंडित मोहनलाल द्विवेदी कहते हैं कि 9वीं व 10वीं सदी के शिलालेख अब भी नहीं पढ़े जा सके हैं। यह अब तक रहस्य बना हुआ है।

मंदिर के ठीक पीछे इतिहास के दो प्रसिद्ध योद्धाओं व देवी भक्त आल्हा- ऊदल के अखाड़े हैं तथा यहीं एक तालाब और भव्य मंदिर है, जिसमें अमरत्व का वरदान प्राप्त आल्हा की तलवार, उनके विशाल प्रतिमा के हाथ में थमाई गई है।

मैहर मंदिर के महंत पंडित देवी प्रसाद बताते हैं कि अब भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं और जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैंं, तो पूजा-अर्चना के निशान मिलते हैं।

इस रहस्य को सुलझाने हेतु वैज्ञानिकों की टीम भी डेरा जमा चुकी है, लेकिन रहस्य अभी भी बरकरार है।

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