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सावन में भोलेनाथ अपने ससुराल में निवास करते हैं, जानिए क्यों लिया था उन्होंने यह फैसला

Published on 6 August, 2018 at 5:05 pm By

सावन का महीना चल रहा है और भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु उनकी आराधना में लीन हैं। इस महीने का इंतजार शिव भक्तों को बेसब्री से रहता है। सावन का महीना भगवान शिव का सबसे प्रिय माना जाता है। इसलिए मान्यता है कि सावन में जो कोई भी सच्चे मन से भोलेनाथ की आराधना करता है, उससे भगवान शिव जल्द ही प्रसन्न होते हैं।


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मान्‍यताओं के अनुसार, इस पावन महीने में भोलेनाथ अपने ससुराल में निवास करते हैं। उनके ससुराल के रूप में उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध मंदिर विख्यात है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर नाम का यह मंदिर हरिद्वार के निकट कनखल में स्थित है।

 

 

भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का नाम माता सती के पिता दक्ष प्रजापति के नाम पर रखा गया है। इस मंदिर का निर्माण 1810 ई में रानी दनकौर ने करवाया तथा 1962 में इस मंदिर का पुनः निर्माण किया गया। यह मंदिर शिव भक्तों के लिए भक्ति और आस्था की एक पवित्र जगह है।

 

 

माता सती के अग्नि कुंड में देह त्याग की कथा सभी अच्छे से जानते हैं। माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के खिलाफ जाकर भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष इस विवाह से बेहद नाखुश थे। इसके पश्चात दक्ष ने अपने वहां एक विराट यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें कई देवताओं और ऋषि मुनियों को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को उन्होंने न्योता नहीं भेजा।


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इसके बाद शिव जी के मना करने के बावजूद बिना निमंत्रण के सती अपने पिता के घर पहुंची। जहां दक्ष ने माता सती और भगवान शिव का काफी अपमान किया। अपने पिता के व्यवहार से आहत और क्रोधित हो माता सती ने यज्ञ की अग्नि कुंड में खुद को भस्म कर लिया।

 



 

जब भगवान शिव को माता सती के देह त्याग के बारे में पता चला तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने दक्ष प्रजापति का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन बाद में क्षमा मांगने पर शिव जी ने उन्हें बकरे का सिर लगाया और क्षमा कर दिया।

 

 

मान्यता है कि इस घटना के बाद भगवान शिव ने हर साल सावन के महीने में कनखल में निवास करने का आह्वान किया। आज यज्ञ कुण्ड के स्थान पर दक्षेस्वर महादेव मंदिर बनाया गया है। आज भी यज्ञ कुण्ड मंदिर अपने स्थान पर है।

 

 

दक्षेश्वर महादेव मंदिर के पास गंगा के किनारे पर दक्षा घाट है, जहां शिव भक्त गंगा में स्नान कर खुद को धन्य मानते हैं। इस मंदिर में भगवान शिव की माता सती को हाथ में लिए एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित है।

 

 


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सावन के महीने में देशभर से लोग यहां पहुंचते हैं। भक्त यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं और भगवान् शिव से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

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