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महान साधक स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारे में ये 13 बातें शायद आप नहीं जानते होंगे

Updated on 18 February, 2017 at 9:42 am By

रामकृष्ण परमहंस भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूतों में प्रमुख हैं। महान साधक, विचारक व संत परमहंस को दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और यही वजह है कि उन्होंने ईश्वर की प्राप्ति के लिए भक्ति का मार्ग अपनाया और कठोर साधना की। वह मानवता के पुजारी थे और उनका दृष्टान्त था कि ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन परमपिता परमेश्वर एक ही है।



रामकृष्ण परमहंस मुख्यतः आध्यात्मिक आंदोलन के प्रणेता थे, जिन्होंने देश में राष्ट्रवाद की भावना को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती हैं। हम यहां स्वामीजी के बारे में कुछ उन बातों का जिक्र करने जा रहे हैं, जिनके बारे में आपको शायद नहीं पता होगा।

1. स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्म बंगाल के कामारपुकूर गांव में 18 फरवरी 1836 को हुआ था।

2. उनके बचपन का नाम था गदाधर चट्टोपाध्याय। पिता का नाम था खुदीराम और माता का नाम चन्द्रमणीदेवी।

3. माना जाता है कि पिता खुदीराम को यह पूर्वाभास हुआ था कि भगवान विष्णु खुद उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यही वजह था कि उन्होंने बालक का नाम रखा गदाधर। भगवान विष्णु का एक नाम गदाधर भी है।

4. जब वह सिर्फ 7 वर्ष के थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया। वह कलकत्ता (कोलकाता) अपने बड़े भाई रामकुमार के पास आ गए। रामकुमार एक पाठशाला के संचालक थे।

5. तमाम प्रयासों के बावजूद रामकृष्ण का मन पढ़ाई में नहीं लगा। इसी बीच, बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को रानी राशमनी द्वारा निर्मित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया गया। रामकृष्ण उनकी सहायता करते थे।

6. युवा रामकृष्ण को देवी की प्रतिमा सजाने का दायित्व दिया गया था। 1856 में रामकुमार की मृत्यु के बाद रामकृष्ण को काली मंदिर का मुख्य पुरोहित बनाया गया।

7. रामकृष्ण की देवी काली के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वह अधिकतर समय ध्यानमग्न रहने लगे। माना जाता है कि उन्हें देवी काली का आशीर्वाद प्राप्त था।

8. परिजनों को लगा कि शादी करा देने से उनमें जिम्मेदारियों को बोध होगा और उनका ध्यान आध्यात्मिक साधना से हट जाएगा।

9. कालान्तर में उनकी शादी करा दी गई शारदामनि मुखोपाध्याय से।

10. समय बीतने के साथ साधक रामकृष्ण परमहंस की सिद्धियों के बारे में लोगों को पता चलने लगा। वे प्रसिद्ध होने लगे।

11. शहर के बड़े विद्धान पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण, गौरीकांत तारकभूषण, केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा ग्रहण करते थे।

12. स्वामी विवेकानन्द उनके परम शिष्य थे।

13. उनकी स्मृति में रामकृष्ण मिशन मठ का निर्माण किया गया था।

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