लाल बहादुर शास्त्री: एक ऐसे प्रधानमंत्री जिन्होंने देश के लिए खाना और वेतन दोनों का त्याग कर दिया था

Updated on 2 Oct, 2018 at 2:04 pm

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ ही आज भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की भी जंयती है, लेकिन गांधी जंयती की चमक में लोगअक्सर शास्त्री जी को भूल जाते हैं। देश के सबसे सादगी पसंद इस प्रधानमंत्री से आज के दौर के नेताओं को सबक सीखना चाहिए कि असल में जनता की सेवा कैसे की जाती है। 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्में शास्त्री जी देश के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहते थे।

 

 


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आज उनकी जंयती के मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं उनकी ज़िंदगी की कुछ दिलचस्प बातें जो बताती है कि वो सच्चे देश भक्त थे। 1962 में हुई लड़ाई में भारत को बहुत नुकसान हुआ था। इसी का फायदा उठाने के लिए पाकिस्तान ने 1965 में युद्ध छेड़ा था। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाक को करारा जवाब दिया और युद्ध जीत लिया।

 

 

लड़ाई के दौरान जब देश में आर्थिक संकट गहरा गया, तो शास्त्री जी ने रामलीला मैदान में लोगों से अपील की कि वो अपने सभी बेकार के खर्च कम कर दें और हफ़्ते में एक दिन उपवास ज़रूर रखें, जिससे भारत को अमेरिका से गेंहू ज्यादा ना खरीदना पड़े और भारत आर्थिक संकट से जल्दी उबर जाए। लोगों से अपील करने के साथ ही लाल बहादुर शास्त्री ने खुद भी उपवास रखना शुरू कर दिया था।

 

 

इतना ही नहीं उस दौरान उन्होंने अपना वेतन लेने से भी इनकार कर दिया था। कहा जाता है कि एक बार शास्त्री जी की धोती फट गई थी तो उन्होंने नई धोती की जगह फटी धोती ही सिलने का आदेश दिया था ताकि फालतू खर्च न हो। शास्त्री जी इतने सादगी पसंद थे कि प्रधानमंत्री होने के बावजूद वो किसी भी सरकारी सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते थें और न ही अपने परिवार वालों को करने देते थे। एक बार उनके बेटे ने सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया तो उससे किलोमीटर के हिसाब से पैसे वसूले थे। वो खुद अपने फटे कुर्ते को फेंकने की बजाय उससे रूमाल बनवा लेते थे।


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