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अनसूया साराभाई की जयंती मना रहा है गूगल, जानिए कौन थीं वह

Published on 11 November, 2017 at 11:26 am By

बुनकरों और टेक्स्टाइल उद्योग के मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए वर्ष 1920 में मजूर महाजन संघ की स्थापना करने वाली प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अनसूया साराभाई का आज जन्मदिन है। मजूर महाजन संघ भारत के टेक्स्टाइल मजदूरों का सबसे बड़ा पुराना संगठन है।


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‘मोटाबेन’ यानि बड़ी बहिन के नाम से पुकारी जाने वाली अनसूया साराभाई का जन्म 11 नवंबर 1885 को अहमदाबाद में हुआ था। इस ख़ास मौके पर गूगल, आज यानी 11 नवंबर के लिए अपना डूडल अनसूया साराभाई को समर्पित कर रहा है।

छोटी उम्र में उठ गया था माता पिता का साया

अनसूया साराभाई का जन्म अहमदाबाद के संपन्न साराभाई परिवार में हुआ था। पिता साराभाई की गिनती उस वक़्त सफल उद्योगपति में होती थी। वहीं, माता गोदावरीबा एक कुशल गृहिणी थीं। हालांकि, महज नौ साल की छोटी उम्र में अनसूया के सिर से माता-पिता दोनों का ही साया उठ गया, जिसके बाद उन्हे अपने भाई अंबालाल साराभाई और छोटी बहन के साथ, चाचा चिमन भाई साराभाई के पास रहने के लिए भेज दिया गया।

आज़ादी से पहले का भारत, बाल विवाह और असमानता जैसे कई कुरीतियों का सामना कर रहा था। इसका दंश अनसूया को भी झेलना पड़ा। अनसूया की शादी मात्र 13 साल की छोटी उम्र में कर दी गई। अनसूया इस शादी से खुश नहीं थीं, जिस कारण उन्होने अपने पति को तलाक़ दे दिया और घर लौट आईं।

घर वापसी के बाद अनसूया ने अपनी पढ़ाई जारी रखने का निश्चय किया। बाद में अपने भाई की मदद से वह 1912 में मेडिकल की डिग्री लेने के लिए इंग्लैंड चली गईं। जहां बाद में जाकर स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में दाखिला लिया।



1913 मे अनसूया भारत वापस लौट आई और भारत में समुदायों के लिए काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने ग़रीब और ज़रूरतमंद छात्रों के लिए एक स्कूल खोला, जिसमें वे खुद अध्यापन का कार्य करती थीं। इसी दौरान एक घटना ने उन्हें बुरी तरह झकझोर के रख दिया, जिसके बाद उन्होंने तय किया कि वे अपना जीवन ग़रीब और मजदूर तबके के लोगों को सशक्त करने में व्यतीत करेंगी।

खेड़ा सत्याग्रह के दौरान साबरमती आश्रम में गाँधी जी के साथ मोटाबेन अनसूया साराभाई
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अनसूया ने अपने घर में ही हरिजन लड़कियों के लिए एक छात्रावास बनवा रखा था। एक दिन जब अनसूया छात्रावास के गलियारे में बैठी थीं तभी उन्होने 14-15 मजदूरों का एक गुट देखा, जो काफ़ी परेशान लग रहे थे। अनसूया ने जब इसकी वजह जाननी चाही, तो वे मजदूरों का जवाब सुन कर भयभीत हो गईं।

अनसूया को पता चला कि मिल मालिक बिना कोई ब्रेक दिए इन मजदूरों से लगातार 36 घंटे काम करवाते हैं। यह किसी गुलामी से कम नहीं था। तब अनसूया ने मजदूर आंदोलन करने का फैसला लिया।

अनसूया का जीवन महात्मा गांधी से प्रभावित था। वर्ष 1914 में मिल मालिकों के मनमानी के विरुद्ध अनसूया ने मजदूरों के साथ मिल कर पहला सत्याग्रह शुरू किया । उनकी अगुआई में अहमदाबाद में हुए इस सत्याग्रह ने टेक्स्टाइल मजदूरों को संगठित करने में मदद किया। इसके बाद वर्ष 1918 में करीब महीने भर चले सत्याग्रह में मिल मालिकों के विरुद्ध अनसूया मजदूरों की आवाज़ बनकर उभरी।

ग़रीब मजदूर की बेटियों के के उत्थान के लिया किया प्रयास mid day


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इस सत्याग्रह में बुनकर अपनी मजदूरी में 50 फीसदी बढ़ोतरी की मांग कर रहे थे, लेकिन उनको सिर्फ 20 फीसदी बढ़ोतरी दी जा रही थी, जिससे असंतुष्ट होकर बुनकरों ने हड़ताल कर दिया था। बाद में जाकर इस सत्याग्रह को गांधी जी का भी साथ मिला। गांधीजी के अनशन पर बैठने के फैसले से मजदूरों के उत्साह में वृद्धि हुई तथा उनका संघर्ष तेज हो गया। मजबूर होकर मिल मालिक समझौता करने को तैयार हो गए अंतत: मजदूरों को 35 फीसदी बढ़ोतरी मिली। इसी के बाद से 1920 में मजूर महाजन संघ की स्थापना हुई।


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अनसूया का जीवन ग़रीब और मजदूर लोगों के निःस्वार्थ उत्थान में बीता। उन्होंने वर्ष 1972 में दुनिया को अलविदा कहा। ऐसी सशक्त महिला को टॉपयप्स की टीम की तरफ से नमन।

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