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रानी चेन्नम्मा: लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेज़ों की सत्ता को चुनौती देने वाली महान वीरांगना

Published on 13 March, 2019 at 6:40 pm By

बचपन से लेकर आज तक हमने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के कई किस्से सुने हैं। उनकी वीरता के किस्से सुनकर ही हमारा बचपन बीता है। लेकिन क्या आप जानते हैं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले एक वीरांगना थीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग की शुरुआत की थी। रानी चेन्नम्मा, यही वो वीरांगना हैं जिन्होंने सबसे पहले अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग छेड़ी थी।


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पुत्र की भांति हुआ लालन-पालन

कित्तूर की रानी चेन्नम्मा (Kittur Rani Chennamma) का जन्म 23 अक्टूबर, 1778 को कर्नाटक राज्य के बिलगावी जिले के छोटे से गांव काकटि में हुआ था। चेन्नम्मा के पिता धूलप्पा और माता पद्मावति थीं। माता पिता ने चेन्नम्मा का लालन-पालन पुत्रों की भांति ही किया था। चेन्नम्मा को बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवारी और युद्ध कला की शिक्षा मिली। उन्हें संस्कृत, कन्नड़, मराठी और उर्दू भाषा का भी ज्ञान था।

 

 

चेन्नम्मा का युद्ध कौशल

रानी चेन्नम्मा युद्ध कौशल में निपुण थीं। एक बार कित्तूर के राजा मल्लसर्ज एक नरभक्षी बाघ का शिकार करने निकले थे। राजा ने बाघ पर बाण चलाया, जिससे वो घायल हो गया। लेकिन जब राजा बाघ के करीब पहुंचे तब उन्होंने पाया कि बाघ को दो बाण लगे थे। तभी राजा की नज़र पास ही सैनिक वेषभूषा में खड़ी एक सुंदर कन्या पर पड़ी। ये कन्या चेन्नम्मा ही थीं। राजा समझ गए ये दूसरा बाण इसी कन्या ने मारा है। राजा ने चेन्नम्मा के पराक्रम की ख़ूब तारीफ़ की।



 

वैवाहिक जीवन

इस घटना के बाद राजा मल्लसर्ज चेन्नम्मा पर मोहित हो गए और उन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा। कुछ समय बाद दोनों का विवाह हो गया। शादी के बाद दोनों का जीवन कुछ समय तक हंसी-खुशी बीता। दोनों का एक बेटा भी हुआ, लेकिन ये खुशी के पल ज़्यादा दिन न चल सके। राजा मल्लसर्ज का अकारण निधन हो गया। उसके कुछ समय बाद ही पुत्र का भी देहांत हो गया। चेन्नम्मा पर एक साथ दुखों का पहाड़ टूट गया। कित्तूर की गद्दी खाली पड़ी थी, जिसे भरने के लिए चेन्नम्मा ने एक पुत्र गोद ले लिया।

 

 

अंग्रेज़ों की नीति का किया विरोध

चेन्नम्मा ने बेटे को गोद लेकर उसे राज सिंहासन पर उत्तराधिकारी के रूप में बैठा दिया। लेकिन अंग्रेज़ों की डाक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स नीति के तहत ऐसा मुमकिन नहीं था। अंग्रेज़ों की नज़र पहले से ही कित्तूर पर थी। उन्होंने चेन्नम्मा के इस निर्णय को मानने से इंकार कर दिया। अंग्रेज़ इस राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। चेन्नम्मा ने अंग्रेज़ों की इस नीति का विरोध किया। चेतावनी देने पर अंग्रेज़ नहीं माने और कित्तूर के किले को चारों ओर से घेर लिया। अंग्रेज़ों के इस कदम का रानी चेन्नम्मा ने भी सशस्त्र सामना किया।

 

 

इतिहास के पन्नों में है चेन्नम्मा का नाम


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लेकिन रानी की सेना छोटी थी और अंग्रेज़ों की सेना बड़ी थी। आधुनिक हथियारों और विशाल सेना की मदद से अंग्रेज़ों ने ये युद्ध जीत लिया। अंग्रेज़ों ने चेन्नम्मा को बंदी बना लिया और उनके कई साथियों को सूली पर चढ़ा दिया। इसके बाद 21 फरवरी 1829 को जेल में ही चेन्नम्मा का निधन हो गया, लेकिन चेन्नम्मा का नाम इतिहास के पन्नों पर आज भी ज़िंदा है।

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