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खबर लहरियाः ग्रामीण समाज का चेहरा बदलता महिलाओं का अखबार

Updated on 22 September, 2015 at 1:30 pm By

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में महिला पत्रकारों के एक समूह को अज्ञात व्यक्तियों द्वारा फोन पर धमकी देने के मामले में पुलिस अचानक हरकत में आ गई। इससे पहले वह इसे साधारण घटना बताकर टालने के मूड में थी।


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दरअसल, महिलाओं के लिए और महिलाओं के द्वारा संचालित अखबार, खबर लहरिया की संपादक ने जब इस प्रताड़ना के संबंध में द लेडीज फिंगर पर विस्तार से लिखा तो यह एक राष्ट्रीय खबर बन गई और पुलिस प्रशासन को हरकत में आने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस खबर के प्रकाशित होने के तुरंत बाद पुलिस ने महिला पत्रकारों को फोन पर धमकाने वाले को धर-दबोचा। अब उस पर कार्रवाई की जा रही है।

यह महिलाओं की उल्लेखनीय जीत थी। हम आपको यहां बताएंगे कि खबर लहरिया क्या है और यह दूसरे अखबारों से किस तरह अलग है।

खबर लहरिया 8-पन्नों का एक साप्ताहिक अखबार है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की चार प्राकृत भाषाओं में प्रकाशित होता है। यह साप्ताहिक महिलाओं के लिए और महिलाओं के द्वारा चलाया जाता है।

यह महिलाओं की सामूहिक मेहनत का ही परिणाम है कि 6 रिपोर्टर और एक हजार कॉपी से शुरू हुए खबर लहरिया की प्रसार संख्या आज 80 हजार कॉपी पहुंच गई है और इसके महिला पत्रकारों की संख्या 40 हो गई है।



इस साप्ताहिक अखबार का प्रसारण उत्तर प्रदेश और बिहार के 800 गावों में होता है, जबकि इसकी छपाई बुन्देली, भोजपूरी, अवधी, हिन्दुस्तानी और बज्जिका में होती है। इस स्थानीय अखबार का ऑनलाइन संस्करण भी उपलब्ध है।


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इस अखबार से जुड़ी अधिकतर महिलाएं निम्न वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित हैं। ये ऐसी घटनाएं या समाचार संग्रहित करती हैं जिससे इनका सीधा सरोकार होता है।

खबर लहरिया के रिपोर्टर अपने इलाकों में राजनीति से लेकर सामाजिक बदलाव, अपराध और लैंगिक हिंसा की खबरें संकलित करती हैं। समाज की इन उपेक्षित महिलाओं ने कड़ी मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण की वजह से पुरुषों और सरकारी अधिकारियों के बीच अपनी जगह बनाई है। अब तो हालत यह है कि इस अखबार के पुरुष पाठकों की संख्या भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

अपनी लगन के माध्यम से इन महिलाओं ने उस मुख्यधारा की पत्रकारिता को भी एक संदेश दिया है, जो सिर्फ मसाला खबरों पर ही निर्भर रहती है। वुमन मीडिया एंड न्यूज (WoMeN) ट्रस्ट की निदेशक दिशा मल्लिक भी इससे सहमत हैं। वह कहती हैंः

“ये महिलाएं उस तरह की रिपोर्टिंग करती हैं, जिसकी मुख्यधारा की पत्रकारिता उपेक्षा करता है। भले ही समाचार सरकारी तंत्र की शक्ति संरचना से जुड़ी हो या फिर प्रशासनिक संरचना से।”


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अपनी बात को सही साबित करने के लिए यह अखबार उन विज्ञापनों को नहीं छापता, जो जातिवाद, सम्प्रदायवाद, लैंगिक भेदभाव, हिंसा या अंधविश्वास को बढ़ावा देता है।

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