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इस कश्मीरी युवा ने BSF परीक्षा में टॉप कर आतंकवाद को मिटाने का लिया प्रण

Published on 10 September, 2016 at 10:54 am By

आज जहां कश्मीर में कुछ युवा अलगाववादी हाथ में पत्थर उठा कर हिजबुल आतंकवादी बुरहान वानी को नायक घोषित कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो यह संदेश दे रहे हैं कि बदलाव के लिए हाथ में पत्थर की जगह कलम का चुनाव करना चाहिए। इन्हीं बदलाव-पसंद लोगों में एक हैं युवा नबील अहमद वानी, जिन्होंने UPSC द्वारा आयोजित BSF की एक महत्वपूर्ण परीक्षा में टॉप किया है।

उधमपुर के रहने वाले नबील का मानना है कि राज्य में आतंकवाद जैसी समस्या का हल सिर्फ सैन्यबल हैं। यही वजह है कि नबील का हमेशा से सपना था कि सैन्यबल ज्वाइन करे।

नबील ने वर्ष 2013 में भी यह परीक्षा दी थी, पर मात्र आठ नंबर कम होने की वजह से उनका यह सपना अधूरा रह गया था।


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नबील ने घाटी में आतंकवाद और ग़लत राह पर चलते कश्मीरी युवाओं जैसे गंभीर मुद्दे पर कहाः

“आजकल सब बुरहान वानी की बात कर रहे हैं। वो भी वानी था और मैं भी वानी हूं, लेकिन आप फर्क देख सकते हैं। मुझे लगता है कि हाथ में पत्थर उठाने से जॉब नहीं मिलेगी। पेन उठाने से मिलेगी। मेरी भी जिंदगी में मुश्किलें थीं, लेकिन मैंने तो बंदूक नहीं उठाई। बेरोजगारी खत्म होगी, तो मुश्किलें भी कम होंगी।”

परेशानियां और ज़िम्मेदारियां बेवक़्त दरवाजे से आती रहीं, लेकिन फोर्स ज्वाइन करने का सपना जीवित रखा।

कश्मीर का नाम रौशन करने वाले नबील को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वह बताते हैं कि उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपने परिवार के साथ कहीं घूमने का प्लान बना सकें। नबील के पिता पेशे से स्कूल शिक्षक थे। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए वह गांव का अपना घर छोड़ उधमपुर रहने आ गए थे।



वानी सरकारी स्कूल में पढ़े और फिर स्कॉलरशिप की बदौलत पंजाब से इंजीनियरिंग की। वहां भी उन्होने टॉप किया। कॉलेज के बाद वह डिफेंस फोर्सेस में जाने की तैयारी करने लगे, लेकिन 2 साल पहले पिता के देहान्त होने के बाद अचानक मां और बहन की शिक्षा की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। इसके बाद उन्होने नौकरी करने का फ़ैसला किया।

बहन की इंजीनियरिंग की फीस से लेकर घर की सारी ज़िम्मेदारी उठाने के लिए नबील उधमपुर में ही वॉटर शेयर डिपार्टमेंट में बतौर जूनियर इंजीनियर काम करने लगे, लेकिन इन ज़िम्मेदारियों और मुश्किलों के बीच भी उन्होने फोर्स ज्वाइन करने का सपना हमेशा जिंदा रखा।

आपको बता दें संघ लोग सेवा आयोग की तरफ से बीएसएफ की असिस्टेंट कमांडेंट की यह परीक्षा 26 जुलाई को आयोजित की गई थी, जिसका नतीजा 5 सितंबर को आया था। इसी दिन नबील ने फ़ेसबुक पर अपने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए लिखाः

“प्यारे पापा, एक दिन हमने मिलकर एक सपना देखा था कि मैं फोर्स में ऑफिसर बनूं। आप जन्नत में हैं और यu सपना मेरे साथ ही रह गया। आज मैं कह सकता हूं कि मैंने पिता का लक्ष्य पा लिया। अब मैं असिस्टेंट कमिश्नर हूं। बीएसएफ में डीएसपी, ऑल इंडिया रैंक-फर्स्ट। अब मेरे कंधे पर तीन स्टार हैं और साथ ही काफी जिम्मेदारियां भी। इसका श्रेय मम्मी और बहन को जाता है।”


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आशा करता हूं कि नबील की ही तरह समस्त युवा कश्मीर घाटी की वास्तविकताओं को देखकर ज़रूरी बदलाव के लिए हाथ में पत्थर की जगह कलम का चुनाव करेंगे।

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