शिव के रौद्र रूप हैं काल भैरव, ‘काशी का कोतवाल’ भी कहते हैं इन्हें

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Updated on 31 Mar, 2016 at 5:12 pm

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गाढ़ा कला रंग, स्थूल शरीर, आग बरसाती बड़ी आंखें, गले में मोटी रूद्राक्ष की माला, काला वस्त्र, एक हाथ में ब्रह्माजी का कटा हुआ सिर, दूसरे हाथ में लोहे का भयानक दंड और काले कुत्ते की सवारी करते हुए काल भैरव का स्मरण करते समय आपको जरूर एक अजीब-सी भय मिश्रित अनुभूति होती होगी।

इसके ठीक विपरीत, काल भैरव बहुत ही दयालु-कृपालु और समस्त जन-गण का कल्याण करने वाले हैं। उनके दर्शन मात्र से शनि और राहु जैसे क्रूर ग्रहों का भी कुप्रभाव समाप्त हो जाता है। इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है।

काल भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है।

ऐसे हुई काल भैरव की उत्पत्ति

शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने देवद्वय ब्रह्मा और विष्णु के समक्ष यह प्रश्न उठाया कि संपूर्ण सृष्टि में श्रेष्ठ कौन है। तो स्वाभाविक तौर पर ब्रह्मा और विष्णु जी ने खुद को श्रेष्ठ बताया। परंतु देवताओं ने यही प्रश्न जब वेदशास्त्रों से पूछा तो वेदशास्त्रों ने उत्तर दिया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान भोलेनाथ ही हैं।

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यह बात भगवान ब्रह्मा और विष्णु को बुरी लगी। इसके बाद अपनी वर्चस्वता साबित करने के लिए दोनों ही भगवान शिव की निन्दा करने लगे। जिससे भगवान भोलेनाथ क्रोधित हो गए। रौद्र रूप में आकर महादेव तांडव करने लगे और इस वजह से प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। पुराणों के अनुसार उसी समय भगवान भोलेनाथ के शरीर से क्रोध से कम्पायमान और विशाल दंडधारी एक प्रचंडकाय काया प्रकट हुई, जिसे महा काल भैरव के नाम से जाना जाता है।

ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति के लिए भटकते हैं सृष्टि में

भगवान भोलेनाथ के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है। कालभैरव के रौद्ररूप ने भगवान भोलेनाथ के अपमान का बदला लेने के लिए अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जिसने शंकर भगवान की निन्दा की थी। लेकिन, इसी कारण भैरव पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया।

ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त होने के लिए भैरव ब्रह्माजी के कटे कपाल को धारण कर तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे।  तत्पश्चात देवों के देव महादेव ने भैरव को अपनी पुरी, काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया। यहां काल भैरव को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली।

काशी के कोतवाल हैं काल भैरव

भगवान शिव को अपनी नगरी काशी से सदैव ही प्रेम रहा है। पुराणों के अनुसार अपनी पुरी काशी की व्यवस्था संचालन की जिम्मेदारी महादेव ने भैरव को दे रखी है। इसलिए काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। काल भैरव के दर्शन किए बगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।

मान्यता है कि बिना इनकी अनुमति के कोई काशी में नहीं रह सकता। एक पैर पर खड़े बाबा कालभैरव काशी के दंडाधिकारी हैं। इसलिए वाराणसी में जब कभी किसी प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी की नियुक्ति होती है, तो वह सर्वप्रथम बाबा काल भैरव के दर्शन करने के बाद ही अपना पद और कार्यभार संभालते हैं।

कालभैरव की पूजा प्राय: पूरे देश में होती है। और अलग-अलग जगहों पर उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र में खण्डोबा उन्हीं का एक रूप है। खण्डोबा की पूजा-अर्चना वहां गांव-गांव में की जाती है।

दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। काशी के तो वह कोतवाल हैं ही। साथ में महाकाल की नगरी उज्जैन में उनके दर्शन, हिंदू दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा दिल्ली के बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर और नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है।



काशी के बाबा भैरवनाथ के दर्शन मात्र से हो जाती है हर मनोकामना पूरी

भारत में बाबा भैरवनाथ के अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं। जिनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके इलावा यह भी मान्यता है की बाबा भैरवनाथ ने काशी की सुरक्षा के लिए 8 चौकियां भी स्थापित कर रखी हैं।

ये इस प्रकार हैं- भीषण भैरव, संहार भैरव, उन्मत्त भैरव, क्रोधन भैरव, कपाली भैरव, असितांग भैरव, चंड भैरव और रूरू भैरव। भगवान भैरव के इन आठ रूपों के मंदिर भी काशी में बहुत प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि यहां दर्शन मात्र से ही हर मनोकामना पूर्ण होती है।

भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है। मान्यता है कि इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता।

बाबा भैरवनाथ की सवारी करते हैं काशी की पहरेदारी

बाबा भैरवनाथ का वाहन कुत्ता है। इसलिए काशी के बारे में कहा भी जाता है कि यहां विचरण करने वाले तमाम कुत्ते काशी की पहरेदारी करते हैं।

जनश्रुतियों के अनुसार कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिये जब औरंगज़ेब के सैनिक काशी पहुँचे। तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरे समूह ने सैनिकों पर हमला कर दिया। कहा जाता है कि उन कुत्तों ने जिस भी सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गए। फिर स्वयं ही वे अपने ही साथियों को काटना शुरू कर दिया।

हड़कंप की ऐसी स्थिति की वजह से सैनिकों को अपनी जान बचा कर भागने के लिये विवश होना पड़ा। इसलिए इन कुत्तों को देव दूत भी कहा जाता है।

मदिरापान कर कष्ट दूर करते हैं उज्जैन के कालभैरव

मृत्यु के स्वामी, संहार के देवता और कालों के काल महाकाल की नगरी उज्जैन में हर दिन कालभैरव चमत्कार दिखाते हैं। यहां हर दिन कालभैरव भक्तों की मदिरा रूपी बुराई को निगल लेते हैं और दूर कर देते हैं उनके हर कष्ट। उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थापित इस मंदिर में शिव अपने भैरव स्वरूप में विराजते हैं। काल भैरव के इस मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा का ही प्रसाद चढ़ता है।

मंदिर के पुजारी, भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद को एक तश्तरी में उड़ेल कर भगवान के मुख से लगा देते हैं। और देखते -देखते ही भक्तों की आंखों के सामने घटता है वो चमत्कार जिसे देखकर भी यकीन करना एक बार को मुश्किल हो जाता है।

मदिरपान करते उज्जैन के काल भैरव dainikbhaskar

मदिरपान करते उज्जैन के काल भैरव dainikbhaskar

बाबा काल भैरव के भक्तों के लिए उज्जैन का भैरो मंदिर किसी धाम से कम नहीं है। सदियों पुराने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसके दर्शन के बिना महाकाल की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। अघोरी जहां अपने इष्टदेव की आराधना के लिए साल भर कालाष्टमी का इंतजार करते हैं, वहीं आम भक्त भी इस दिन उनके आगे शीश नवा कर आशीर्वाद हासिल करना नहीं भूलते।

काल भैरव के स्मरण मात्र से मन में एक अजीब सी शांति का एहसास होता है। लगता है मानो सारे दुःख दूर हो गए। कालभैरव को ग्रहों की बाधाएं दूर करने के लिए जाना जाता है। भैरव का अर्थ होता है, भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। भय को हरण करके भक्तों की हर मुराद पूरी करने वाले भगवान शिव अंश, काल भैरव को मेरा प्रणाम।


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