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कारगिल युद्ध का यह हीरो आज लोगों के जूठे बर्तन धोने को मजबूर है, ढेर किए थे 7 पाकिस्तानी सैनिक

Published on 30 July, 2018 at 5:06 pm By

साल 1999 में कश्मीर के कारगिल जिले में भारत-पाकिस्तान के बीच सशस्त्र संघर्ष हुआ, जिसे हम कारगिल युद्ध के नाम से जानते हैं। यह युद्ध इसलिए लड़ा गया, क्योंकि पाकिस्तान की सेना ने कश्मीरी आतंकवादियों के साथ मिलकर भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, लेकिन भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया और जल्द ही पाकिस्तान के कब्जे वाली जगहों पर भारत का झंडा फहरा दिया। भारत की विजय के साथ 26 जुलाई को यह युद्ध समाप्त हुआ।


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इस भीषण युद्ध में हमने अपने कई जवान खोए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस युद्ध में हमारे 527 जवान शहीद हुए और करीब 1,300 से ज्यादा योद्धा घायल हुए थे। कारगिल के उन घायल योद्धाओं में से एक नाम लांस नायक सतवीर सिंह का भी था।

 

 

कारगिल युद्ध को हुए 19 साल हो गए, तब से लेकर अब तक इस सुरवीर जवान के पैर में पाकिस्तान की एक गोली फंसी हुई है, जिसकी वजह से वो अच्छे से चल नहीं सकते। ऐसे में बैसाखी ही उनका सहारा है। जिसने अपने जिस्म पर देश के लिए लड़ते हुए गोलियां खाई, उसे आज पूछने वाला कोई नहीं है।

 

अपने घर का जीवन-यापन करने के लिए उनके पास पर्याप्त जीविका के साधन नहीं हैं। वह अपने परिवार का खर्च एक छोटी सी जूस की दूकान से चला रहे हैं।


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दिल्ली के रहने वाले सतवीर सिंह कारगिल युद्ध के वक्त राजपुताना राइफल्स में लांसनायक के पद पर तैनात थे। तोलोलिंग की लड़ाई में सतवीर सिंह अपना शौर्य और पराक्रम दिखाते हुए बुरी तरह घायल हो गए थे। कारगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर सतवीर 9 सैनिकों की टुकड़ी की अगुवाई कर रहे थे। उस लड़ाई का जिक्र करते हुए सतवीर बताते हैंः

 



“वह 13 जून 1999 की सुबह थी। कारगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर थे। तभी घात लगाए पाकिस्तानी सैनिकों की टुकड़ी से आमना-सामना हो गया। पाकिस्तानी सैनिक 15 मीटर की दूरी पर थे। हमें कवरिंग फायर मिल रहा था लेकिन 7 जवान हमारे भी शहीद हुए थे। उसी दरम्यान कई गोलियां लगीं। उनमें एक, पैर की एड़ी में आज भी फंसी हुई है। 17 घंटे वहीं पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। सारा खून बह चुका था। 3 बार हेलीकॉप्टर भी हमें लेने आए। लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग की वजह से नहीं उतर पाया। हमारे सैनिक ही हमें ले गए। एयरबस से श्रीनगर लाए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। घायल होने पर इलाज दिल्ली सेना के बेस अस्पताल में करीब एक साल तक चला।”

 

 

उस युद्ध में शहीद हुए अफसरों, सैनिकों की विधवाओं, घायल हुए जवानों के लिए तत्कालीन सरकार में खेती की जमीन और पेट्रोल पंप  मुहैया करवाने का ऐलान किया गया।  सतवीर सिंह को पेट्रोल पंप अलॉट तो हो गया, लेकिन वो उन्हें कभी मिला ही नहीं। उन्हें गुजर-बसर के लिए 5 बीघा जमीन जरूर दी गई, लेकिन बाद में वो भी उनसे छीन ली गई। अपनी आप बीती बताते हुए सतवीर सिंह ने कहा कि जो जमीन उन्हें दी गई थी उसमें उन्होंने फलों का बाग लगाया था। तीन साल तक सब ठीक चल रहा था, तभी एक बड़ी पार्टी के नेता ने उनसे संपर्क किया। उस नेता ने सतवीर सिंह के सामने एक पेशकश रखी कि जो पेट्रोल पंप उनको अलॉट हुआ है उसे वे उस नेता के नाम कर दें। सतवीर सिंह ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद अपने रौब के बलबूते पर उस नेता ने सतवीर सिंह से उसका सब कुछ छीन लिया। बड़ी तकलीफ होती है ये कहते हुए पाकिस्तान को धूल चटाने वाला यह जांबाज जवान भ्रष्टाचारी सिस्टम के आगे हार गया।

लांस नायक सतवीर ने भरे मन से बताया कि उन्होंने करीब 13 साल 11 महीने सेना में अपनी सेवाएं दी और इसी दौरान, कारगिल युद्ध हुआ था। युद्ध में घायल होने के बाद मेडिकल ग्राउंड पर उन्हें अनफिट करार दे दिया गया। दिल्ली का अकेला सिपाही होने पर सिर्फ सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। उन्होंने बताया कि 19 साल से वह अपने हक की लड़ाई अकेले ही लड़ रहे हैं। उनकी फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में चक्कर लगा रहीं है, लेकिन आज तक कहीं से कोई मदद का हाथ सामने नहीं आया।

 

 

सतवीर सिंह ने बताया कि सबकुछ छीनने के बाद दो बेटों की पढ़ाई का खर्चा तक वह नहीं उठा सके। बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। अब पेंशन और जूस की दुकान से जो पैसा मिलता है उससे ही वह गुजर-बसर कर रहे हैं।

 


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सच में, इस देश के जवान की ऐसी दुर्दशा देखकर दिल छलनी होता है। जिस जवान को उसका हक, आदर-सत्कार मिलना चाहिए, देश के कुछ हुक्मरानों ने उसे अपने फायदे के लिए लाचार बना दिया।

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