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17 साल की इस शहीद की बेटी ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में परचम लहरा कर पिता को दी श्रद्धांजलि

Published on 1 August, 2016 at 5:45 pm By

कारगिल युद्ध 28 मई 1999, यह वही तारीख है, जब भारत ने अपने एक वीर जवान सिपाही बूटा सिंह को खो दिया था। उस दिन शहीद की विधवा हो चुकी पत्नी अमृतपाल कौर ने अपना सुहाग खोया था, तो एक नन्ही बेटी कोमल प्रीत कौर ने अपने पिता का सहारा। लेकिन 21 साल की अमृतपाल कौर ने जो नहीं खोया, वह था अपनी बेटी के भविष्य के लिए आशा।

आज जब सत्रह साल बाद उसी बेटी ने रक्षा श्रेणी में पंजाब मेडिकल प्रवेश परीक्षा (PMET) को टॉप किया, तो उस मां के लिए गर्व की बात तो है ही, साथ ही उस शहीद पिता के लिए सच्ची श्रद्धांजलि भी है।

कोमल को गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, पटियाला में दाखिला मिल जाने की उम्मीद है।


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टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ एक बातचीत में कौर उस दिन को याद करते हुए बताती हैं, जिस दिन उनके पति का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा उनके गांव दनेवाला, मानसा पहुंचा थाः

“जिस दिन मुझे उनकी शहादत के बारे में बताया गया था मुझे ऐसा लगा की मैं इस दुनिया की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण औरत हूँ। मैं सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए आगे बढ़ी और जो कुछ भी मैं कर सकती थी उसके लिए किया।”

38 साल की हो चूँकि अमृतपाल को इस बात का भी दुःख है कि वह अपने पति के पोस्टिंग के वजह से सिर्फ़ 4 महीने ही उनके साथ रह पाई। फिर भी उनसे जुड़ी जितनी भी यादें समेट पाती हैं, उनको याद करते हुए बताती हैंः

“1996 में हमारी शादी हुई थी, तब मैं 18 साल की भी नही हुई थी और सिर्फ बारहवीं पास थी। मेरे हिस्से में मेरे पति का साथ सिर्फ़ 4 महीने का था, जो उन्होने मेरे साथ 1996 और 1997 में दो महीने कर के बिताए थे। उनसे जुड़ी मेरे पास इतनी ही थोड़ी सी यादें हैं।”



14 सिख रेजिमेंट के जवान सिपाही बूटा सिंह मात्र 26 साल के थे, जब कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। वह  20 साल की उम्र में भारतीय सेना में दाखिल हो गए थे। उनकी मृत्यु के छह महीने के बाद अमृतपाल कौर को मानसा के उपायुक्त के कार्यालय में एक वरिष्ठ सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था।

दो साल बाद 2002 में अपनी बेटी के भविष्य की खातिर, अमृतपाल ने बूटा के छोटे भाई के साथ शादी रचाई। ज़िंदगी के इस कठिन फ़ैसले के बारे में अमृतपाल कहती हैंः

“मुझे जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ा है और यह सहन कर पाना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल था कि मेरी बेटी बिना पिता के प्यार के बड़ी हो। यही कारण है कि मैने उनके भाई भगवान सिंह से शादी की।”


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भगवान जो पेशे से एक किसान हैं, लेकिन उनका प्यार और स्नेह हमेशा कोमल के लिए किसी सगे पिता से कम नही रहा। कोमल के अलावा उनके अमृतपाल से दो संताने और भी हैं।

आज जब 17 साल की कोमल डॉक्टर बनने से सिर्फ़ एक कदम दूर हैं, तो माँ अमृतपाल की आँखें नम हो जाती हैं। वह कोमल के बारे में कहती हैंः

“वह बहुत मेहनती लड़की है। मुझे यकीन है वो हमेशा बेहतर करेगी और खुद अपने दम पर बेहतर भविष्य चुनेगी।”


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एक परिवार के लिए किसी के खोने का गम हमेशा ही ज़्यादा होता है, लेकिन कोमल जैसी बेटियों को जब उन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से लड़कर आगे बढ़ते देखा जाता है, तो कह सकते हैं कि यह निश्चित रूप से उन अपनों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। साथ में हमारे शहीद परिवार के लिए प्रेरणा भी है। टॉपयॅप्स टीम सभी शहीद परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए मंगलकामना करती है। जय हिंद!

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